तकनीकी पात्रता पर विशेषज्ञ समिति के फैसले में अदालतें नहीं करेंगी दखल, जब तक दुर्भावना या स्पष्ट मनमानी साबित न हो: पटना हाईकोर्ट
Amir Ahmad
25 Jun 2026 3:21 PM IST

पटना हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत न्यायिक समीक्षा की शक्ति का प्रयोग करते समय अदालतें विशेषज्ञ निविदा समितियों द्वारा तय की गई तकनीकी पात्रता का नए सिरे से मूल्यांकन नहीं कर सकतीं।
अदालत केवल तभी हस्तक्षेप कर सकती है जब निर्णय दुर्भावनापूर्ण, मनमाना या स्पष्ट रूप से विकृत और अवैध साबित हो।
जस्टिस सुधीर सिंह और जस्टिस रंजन कुमार झा की खंडपीठ एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें याचिकाकर्ता संयुक्त उद्यम को तकनीकी रूप से सफल घोषित करने और उसकी वित्तीय बोलियों पर विचार करने का निर्देश देने की मांग की गई।
मामला लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग द्वारा जारी निविदाओं से जुड़ा था। याचिकाकर्ता संयुक्त उद्यम, जिसमें उमाकांत सिंह और लोकादित्य कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड शामिल थे, ने किशनगंज, फारबिसगंज और कटिहार से संबंधित विभिन्न कार्यों के लिए बोली लगाई।
हालांकि, विभाग ने उनकी तकनीकी बोली को कुछ निर्धारित शर्तों का पालन न करने के आधार पर अस्वीकार कर दिया।
याचिकाकर्ता का कहना था कि सभी आवश्यक दस्तावेज जमा किए गए थे और एक निविदा में उसकी बोली को इस आधार पर खारिज किया गया कि संयुक्त उद्यम समझौते का प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट से सत्यापन नहीं कराया गया, जबकि ऐसी कोई शर्त निविदा दस्तावेजों में मौजूद नहीं थी।
अन्य निविदाओं के संबंध में भी दावा किया गया कि संयुक्त उद्यम के सदस्य सामूहिक रूप से अनुभव संबंधी सभी आवश्यक शर्तें पूरी करते थे।
वहीं, राज्य सरकार और विभाग की ओर से कहा गया कि याचिकाकर्ता निविदा दस्तावेजों में निर्धारित पात्रता मानकों को पूरा करने में विफल रहा। विभाग के अनुसार, संयुक्त उद्यम के लिए कुछ विशेष प्रावधानों का सामूहिक रूप से पालन करना अनिवार्य था और प्रस्तुत दस्तावेजों की जांच में इन शर्तों का अनुपालन नहीं पाया गया।
सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष एक जांच रिपोर्ट भी रखी गई, जिसमें तकनीकी मूल्यांकन के दौरान समान स्थिति वाले बोलीदाताओं के साथ एकरूपता न बरते जाने की बात कही गई और पूरी निविदा प्रक्रिया रद्द कर नई निविदाएं जारी करने की सिफारिश की गई।
मामले पर विचार करते हुए खंडपीठ ने कहा कि किसी बोलीदाता की तकनीकी और पात्रता संबंधी शर्तों का आकलन करना विशेषज्ञ समितियों का कार्यक्षेत्र है।
अदालत ने कहा,
“जब तक निर्णय को मनमाना, दुर्भावनापूर्ण या स्पष्ट रूप से विकृत नहीं दिखाया जाता, तब तक अदालत निविदा मूल्यांकन समिति के आकलन के स्थान पर अपना आकलन नहीं थोपेगी।”
अदालत ने पाया कि निविदा मूल्यांकन समिति ने याचिकाकर्ता द्वारा जमा दस्तावेजों की जांच के बाद यह निष्कर्ष निकाला था कि आवश्यक पात्रता शर्तें पूरी नहीं हुई।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल इस कारण कि जांच समिति ने निविदा प्रक्रिया रद्द कर दोबारा निविदा जारी करने की सिफारिश की थी, यह नहीं माना जा सकता कि याचिकाकर्ता को गलत तरीके से अयोग्य ठहराया गया, या उसने सभी पात्रता शर्तें पूरी कर ली थीं।
न्यायिक समीक्षा के स्थापित सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा कि संविदात्मक मामलों में अदालतें निर्णय की गुणवत्ता नहीं, बल्कि निर्णय लेने की प्रक्रिया की जांच करती हैं।
खंडपीठ ने कहा,
“विशेषज्ञ संस्था द्वारा पात्रता शर्तों के आकलन से केवल असहमति होना अदालत के लिए बोली दस्तावेजों का नया मूल्यांकन करने का आधार नहीं बन सकता।”
मामले के तथ्यों में अदालत को निविदा मूल्यांकन समिति के निर्णय में किसी प्रकार की दुर्भावना, मनमानी या स्पष्ट कानूनी त्रुटि नहीं मिली।
इसके चलते हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की तकनीकी अयोग्यता में हस्तक्षेप करने से इनकार किया और याचिका खारिज की।

