अरेस्ट मेमो में गिरफ्तारी के कारण समझाने की बात लिखना पर्याप्त नहीं, लिखित में देना जरूरी: पटना हाईकोर्ट
Amir Ahmad
8 Oct 2026 1:32 PM IST

पटना हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि अरेस्ट मेमो में केवल यह दर्ज कर देना कि गिरफ्तारी करने वाले अधिकारी ने आरोपी को गिरफ्तारी के कारण समझा दिए, संविधान के अनुच्छेद 22 की अनिवार्यता का पालन नहीं माना जा सकता। गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में उपलब्ध कराना जरूरी है।
कोर्ट ने कहा कि अरेस्ट मेमो के तयशुदा प्रारूप में की गई ऐसी औपचारिक प्रविष्टि, जिसमें गिरफ्तारी के कारण बताए जाने का उल्लेख हो, लिखित रूप में गिरफ्तारी के आधार उपलब्ध कराने की संवैधानिक और वैधानिक आवश्यकता को पूरा नहीं करती।
जस्टिस राजीव रंजन प्रसाद और जस्टिस सुनील दत्ता मिश्रा की डिवीजन बेंच ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी अधिनियम, 2008 (NIA Act) की धारा 21(4) के तहत दायर अपील पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। मामला कथित तौर पर नकली भारतीय मुद्रा के प्रसार से जुड़ा था। अपीलकर्ता ने नियमित जमानत खारिज किए जाने के स्पेशल कोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी।
मामला 5 सितंबर 2024 को पूर्वी चंपारण के खरवा पूल के पास पुलिस द्वारा की गई कार्रवाई से शुरू हुआ। अभियोजन के अनुसार, मोटरसाइकिल से जा रहे तीन लोगों के पास से नकली भारतीय करेंसी नोट बरामद हुए। बाद में गृह मंत्रालय के 10 दिसंबर 2024 के आदेश के तहत जांच एनआईए को सौंप दी गई।
अपीलकर्ता इस मामले में आरोपी नंबर चार था और उसे मौके से गिरफ्तार नहीं किया गया। चार्जशीट में आरोप लगाया गया कि उसके मोबाइल फोन में नकली करेंसी से संबंधित पीडीएफ फाइलें, आपत्तिजनक वॉयस क्लिप, तस्वीरें, संदिग्ध व्यक्तियों के संपर्क विवरण और नकली नोटों की खरीद-फरोख्त से जुड़ी चैट मिली थीं। अपीलकर्ता का कहना था कि सह-आरोपियों से उसकी बातचीत केवल सोशल मीडिया के जरिए हुई थी और इसी के चलते उनके बीच कारोबारी संबंध बने थे।
अपीलकर्ता ने हाईकोर्ट के सामने अपनी गिरफ्तारी को इस आधार पर चुनौती दी कि उसे गिरफ्तारी के कारण कभी लिखित रूप में उपलब्ध नहीं कराए गए। सुनवाई के दौरान NIA ने भी स्वीकार किया कि ऐसा कोई लिखित दस्तावेज रिकॉर्ड पर मौजूद नहीं है, हालांकि उसने अरेस्ट मेमो के पैराग्राफ-7 पर भरोसा किया, जिसमें गिरफ्तारी के कारण आरोपी को समझाए जाने का उल्लेख था।
हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 22 और तत्कालीन दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 50 के तहत गिरफ्तारी के कारण बताए जाने की आवश्यकता पर सुप्रीम कोर्ट के पंकज बंसल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया, अहमद मंसूर बनाम स्टेट, डॉ. राजिंदर राजन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और मिहिर राजेश शाह बनाम यूनियन ऑफ इंडिया जैसे फैसलों का भी संदर्भ लिया।
बेंच ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 22 और कानून में मौजूद प्रावधानों के तहत जांच एजेंसी या गिरफ्तारी करने वाले अधिकारी के लिए यह जरूरी है कि गिरफ्तारी के लिखित कारणों की एक प्रति गिरफ्तार व्यक्ति को सामान्य रूप से और बिना किसी अपवाद के उपलब्ध कराई जाए।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अरेस्ट मेमो में यह लिख देना कि गिरफ्तारी से पहले अधिकारी ने आरोपी को गिरफ्तारी के कारण समझा दिए, पर्याप्त नहीं है। हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे तयशुदा प्रारूप वाले अरेस्ट मेमो संविधान के अनुच्छेद 22 के साथ तत्कालीन NIA की धारा 50 और 50ए तथा अब BNSS की धारा 47 और 48 में निहित अनिवार्यता का पालन नहीं करते।
कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल अरेस्ट मेमो में मौजूद प्रोफार्मा प्रविष्टि के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि अहमद मंसूर और डॉ. राजिंदर राजन के मामलों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित आवश्यकताओं का पालन किया गया।
बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के स्टेट ऑफ कर्नाटक बनाम श्री दर्शन मामले को भी अलग माना। उस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि आरोपियों को अपनी गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी थी और वे यह नहीं दिखा पाए थे कि इससे उन्हें कोई नुकसान या पूर्वाग्रह हुआ। मौजूदा मामले में हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य ऐसा कोई दस्तावेज पेश करने में विफल रहा, जिससे यह साबित हो सके कि अपीलकर्ता को गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में वास्तव में उपलब्ध कराए गए।
हाईकोर्ट ने मिहिर राजेश शाह के फैसले का हवाला देते हुए यह भी कहा कि गिरफ्तारी के कारण उचित समय के भीतर लिखित रूप में बताए जाने चाहिए और किसी भी स्थिति में गिरफ्तार व्यक्ति को रिमांड के लिए पेश किए जाने से कम से कम दो घंटे पहले इसकी जानकारी दी जानी चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि इस मामले में प्रतिवादी यह साबित करने में विफल रहा कि गिरफ्तारी या हिरासत के आधार लिखित रूप में उपलब्ध कराए गए। यहां तक कि कोर्ट की ओर से समय दिए जाने के बावजूद गिरफ्तारी के लिखित कारणों की तामील से संबंधित कोई दस्तावेज पेश नहीं किया गया।
इस आधार पर हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता की गिरफ्तारी को संवैधानिक और वैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन माना और स्पेशल कोर्ट के जमानत खारिज करने वाला आदेश रद्द किया। इसके साथ ही कोर्ट ने अपीलकर्ता को जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया।
इस मामले में ट्रायल शुरू हो चुका था, लेकिन 91 में से केवल तीन गवाहों की ही गवाही हुई। अपीलकर्ता ने यह भी दलील दी थी कि मौजूदा स्थिति में मुकदमे के जल्द खत्म होने की संभावना नहीं है।

