गिरफ्तारी के लिखित आधार न बताने से रिमांड अपने आप अवैध नहीं: पटना हाईकोर्ट
Amir Ahmad
4 Nov 2026 8:52 PM IST

पटना हाईकोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी के लिखित आधार आरोपी को नहीं बताए जाने के कारण हिरासत को चुनौती देने के मामले में यह देखना जरूरी है कि इस चूक से आरोपी को कोई वास्तविक नुकसान हुआ या नहीं। कोर्ट ने एक आरोपी के रिमांड को चुनौती देने वाली बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका खारिज की। कोर्ट ने पाया कि आरोपी को अपने खिलाफ लगे आरोपों की पहले से जानकारी थी, उसने अग्रिम जमानत मांगी थी और उसके वकील ने रिमांड का विरोध भी किया।
जस्टिस राजीव रंजन प्रसाद और जस्टिस राणा विक्रम सिंह की खंडपीठ ने कहा कि गिरफ्तारी के समय आरोपी के लिए आरोप कोई अप्रत्याशित बात नहीं थी। उसके पास रिमांड का विरोध करने के लिए पर्याप्त जानकारी थी।
कोर्ट शशि भूषण प्रसाद सिंह की ओर से दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई कर रहा था। याचिका में उनके बेटे दिव्य प्रकाश की हिरासत को चुनौती दी गई। दिव्य प्रकाश के खिलाफ खगड़िया के चित्रगुप्त नगर पुलिस स्टेशन में दर्ज FIR के तहत भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 108/3(5) के अंतर्गत अभियोजन चल रहा था।
दिव्य प्रकाश को 5 जून 2026 को मजिस्ट्रेट द्वारा जारी गैर-जमानती वारंट के आधार पर गिरफ्तार किया गया। उस समय उसकी अग्रिम जमानत याचिका हाईकोर्ट में लंबित थी। गिरफ्तारी के बाद उसे संबंधित मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया, जिन्होंने 6 जून 2026 को रिमांड का आदेश पारित किया। इस दौरान उसका वकील वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश हुआ और उसने रिमांड का विरोध किया।
सेशंस कोर्ट से नियमित जमानत याचिका खारिज होने के बाद दिव्य प्रकाश ने हाईकोर्ट का रुख किया। 29 सितंबर 2026 को सिंगल जज ने केस डायरी तलब की। अगले दिन उसके पिता ने मौजूदा बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की।
याचिकाकर्ता ने रिमांड को इस आधार पर चुनौती दी कि उसके बेटे को गिरफ्तारी के लिखित आधार नहीं दिए गए। उसने यह भी दलील दी कि केवल गैर-जमानती वारंट जारी कर देना पर्याप्त नहीं है। गिरफ्तारी के समय आरोपी को वारंट पढ़कर सुनाया गया था, यह साबित करना भी जरूरी है।
याचिका का विरोध करते हुए राज्य ने कहा कि दिव्य प्रकाश FIR में नामजद आरोपी था और उसे अपने खिलाफ लगे आरोपों की पूरी जानकारी थी। राज्य ने बताया कि वह पहले ही अग्रिम जमानत के लिए आवेदन कर चुका था और गैर-जमानती वारंट वापस लेने की मांग भी कर चुका था। कोर्ट को यह भी बताया गया कि मामले में चार्जशीट दाखिल हो चुकी है, संज्ञान लिया जा चुका है और मामला सेशंस कोर्ट को सौंप दिया गया।
दलीलों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपी को आरोपों की जानकारी होने की बात उसकी पिछली कानूनी कार्यवाहियों से स्पष्ट है। इनमें अग्रिम जमानत याचिका और वारंट रद्द कराने के लिए दिया गया आवेदन शामिल हैं।
खंडपीठ ने रिमांड आदेश दर्ज करने की प्रक्रिया को लेकर लगाए गए आरोपों को भी स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि रिमांड आदेश अच्छी तरह लिखा गया था और यह स्वीकार किया गया कि आरोपी का वकील वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश होकर रिमांड का विरोध कर चुका था।
वास्तविक नुकसान के आधार पर जांच करने की कसौटी लागू करते हुए कोर्ट ने कहा,
“सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के आलोक में मौजूदा मामले के तथ्यों पर विचार करने के बाद हमारी सुविचारित राय है कि जब इस मामले में वास्तविक नुकसान पर आधारित कसौटी लागू की जाती है, तो यह रिट याचिका खारिज किए जाने योग्य है। जैसा कि ऊपर देखा गया, याचिकाकर्ता के बेटे को अपनी गिरफ्तारी के आधारों की पूरी जानकारी थी। यह ऐसा मामला नहीं है, जिसमें उसे अचानक गिरफ्तार कर लिया गया हो और उसके पास रिमांड का विरोध करने के लिए कोई जानकारी या सामग्री उपलब्ध न हो। तथ्य यह है कि उसका वकील वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश हुआ और उसने रिमांड आदेश का विरोध किया।”
कोर्ट ने कहा कि आरोपों की पहले से जानकारी और रिमांड को चुनौती देने का अवसर, गिरफ्तारी के लिखित आधार नहीं बताए जाने के आरोप का आकलन करने में महत्वपूर्ण परिस्थितियां हैं।
प्रक्रियात्मक खामी के आधार पर रिमांड में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं पाते हुए हाईकोर्ट ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका खारिज की।
कोर्ट ने 28 अक्टूबर 2026 के अपने पहले के आदेश का भी उल्लेख किया, जिसमें याचिकाकर्ता पर 5,000 रुपये का जुर्माना लगाया गया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि निर्धारित समय में जुर्माना जमा करने का प्रमाण पेश नहीं किए जाने पर कानून के अनुसार उसकी वसूली के कदम उठाए जाएं।

