POCSO में भी बेगुनाही की धारणा खत्म नहीं होती: पटना हाईकोर्ट ने 20 साल की सजा पाए व्यक्ति को किया बरी
Amir Ahmad
24 Aug 2026 5:27 PM IST

पटना हाईकोर्ट ने POCSO मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए 20 साल की सजा पाए एक व्यक्ति को बरी किया। कोर्ट ने कहा कि POCSO Act की धाराएं 29 और 30 अभियोजन को अपराध के बुनियादी तथ्य साबित करने की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करतीं। जब अभियोजन अपराध के मूल तथ्यों को ही साबित करने में विफल रहता है, तब इन कानूनी धारणाओं के आधार पर दोषसिद्धि कायम नहीं रखी जा सकती।
जस्टिस राजीव रंजन प्रसाद और जस्टिस रमेश चंद्र मालवीय की खंडपीठ ने कहा कि POCSO Act के तहत मामला होने मात्र से आरोपी के निर्दोष होने की धारणा समाप्त नहीं हो जाती। कोर्ट ने माना कि निचली अदालत ने कानूनी धारणाओं को समझने में गलती की और इसी कारण वह अभियोजन के मामले से पूरी तरह प्रभावित हो गई।
मामला वर्ष 2015 का है। अभियोजन के अनुसार आरोपी अप्रैल 2015 में उस घर में घुसा था, जहां 11 वर्षीय बच्ची अपने नाना-नानी के साथ रह रही थी। आरोप था कि बच्ची के अकेले होने के दौरान आरोपी ने उसके साथ यौन अपराध किया। अगले दिन बच्ची की मां ने मामला दर्ज कराया था।
हालांकि, मुकदमे के दौरान बच्ची ने अभियोजन के आरोपों का समर्थन नहीं किया। उसने अदालत में कहा कि उसे नहीं पता कि उसकी मां ने मामला क्यों दर्ज कराया। उसने पुलिस को आरोपी के खिलाफ दुष्कर्म संबंधी कोई बयान देने से भी इनकार किया। इसके बाद अभियोजन ने उसे पक्षद्रोही घोषित कर दिया।
हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन बच्ची के कथित पहले बयान को भी जांच अधिकारी के माध्यम से साबित नहीं कर सका। जांच अधिकारी ने अपने बयान में यह नहीं कहा कि जांच के दौरान बच्ची या उसकी मां ने अभियोजन की कहानी का समर्थन किया था।
मेडिकल साक्ष्य भी अभियोजन के पक्ष में निर्णायक नहीं था। डॉक्टर को बच्ची के शरीर पर कोई चोट नहीं मिली। कौमार्य झिल्ली सुरक्षित थी और योनि से लिए गए सैंपल में शुक्राणु भी नहीं मिला। डॉक्टर ने केवल यह संभावना जताई कि यौन संबंध बनाने का प्रयास किया गया हो सकता है।
POCSO Act की धाराओं 29 और 30 के तहत अभियोजन के पक्ष में बनने वाली कानूनी धारणा पर हाईकोर्ट ने विशेष रूप से कहा, POCSO Act के तहत मामलों में निर्दोष होने की धारणा समाप्त नहीं होती।”
पीठ ने कहा कि इस मामले में अपराध के बुनियादी तथ्य ही मौजूद नहीं हैं । जब पीड़िता खुद कह रही है कि उसे यह नहीं पता कि मामला क्यों दर्ज कराया गया और उसने पुलिस को आरोपी के खिलाफ कोई बयान नहीं दिया तो ऐसी स्थिति में निचली अदालत द्वारा कानूनी धारणाओं का इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है।
कोर्ट ने अभियोजन की कहानी में कई गंभीर विरोधाभास भी पाए। अभियोजन का दावा था कि घटना के समय बच्ची घर में अकेली थी, जबकि उसकी नानी की गवाही से पता चला कि वह उस समय घर में मौजूद थीं। बच्ची की मां ने यह भी कहा था कि उसे पड़ोसियों के फोन से घटना की जानकारी मिली, लेकिन वह उस पड़ोसी का नाम नहीं बता सकीं, जिसने उसे फोन किया था।
इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने मामले को साक्ष्यहीन मामला बताया। कोर्ट ने यह भी कहा कि उसे यह मानने का कारण है कि शिकायत पैसे ऐंठने के उद्देश्य से दर्ज कराई गई हो सकती है। अदालत ने आरोपी को POCSO Act की धारा 22 के तहत झूठी शिकायत के संबंध में उचित कानूनी कदम उठाने की स्वतंत्रता भी दी।
हाईकोर्ट ने निचली अदालत द्वारा दी गई सजा में भी गंभीर कानूनी गलती पाई। कथित अपराध वर्ष 2015 का था। उस समय POCSO Act की धारा 4 में न्यूनतम सात वर्ष की सजा का प्रावधान था। 20 वर्ष की न्यूनतम सजा का प्रावधान वर्ष 2019 के संशोधन के जरिए बाद में जोड़ा गया।
कोर्ट ने कहा कि निचली अदालत इस बात से पूरी तरह अनजान प्रतीत हुई कि वर्ष 2019 का संशोधन कब लागू हुआ। इसलिए बाद में लागू हुए संशोधित प्रावधान के आधार पर वर्ष 2015 के कथित अपराध में सजा देना भी कानूनन सही नहीं था।
हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि और 20 वर्ष की सजा का आदेश रद्द करते हुए आरोपी को POCSO Act की धारा 4 के आरोप से बरी कर दिया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि किसी अन्य मामले में उसकी आवश्यकता नहीं है तो उसे तत्काल रिहा किया जाए।


