शराबबंदी पुलिस की हिरासत के बाद युवक लापता: पटना हाईकोर्ट ने CBI जांच के दिए आदेश, पुलिस की निष्क्रियता पर जताई नाराजगी
Amir Ahmad
11 Aug 2026 6:11 PM IST

पटना हाईकोर्ट ने भोजपुर जिले में शराबबंदी पुलिस अधिकारियों द्वारा कथित तौर पर हिरासत में लिए जाने और बेरहमी से पीटे जाने के बाद लापता हुए एक युवक के मामले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंप दी।
अदालत ने मामले को दुर्लभ और असाधारण परिस्थितियों वाला बताते हुए राज्य पुलिस की जांच पर गंभीर सवाल उठाए और कहा कि मामले में जिस तरह की निष्क्रियता दिखाई गई, उससे राज्य की जांच एजेंसी की विश्वसनीयता पर ही सवाल खड़ा हो गया।
जस्टिस राजीव रंजन प्रसाद और जस्टिस आलोक कुमार सिन्हा की खंडपीठ ने कहा कि प्राथमिकी दर्ज होने के बाद भी राज्य की जांच एजेंसी ने उस तत्परता से कार्रवाई नहीं की, जिसकी इस मामले में आवश्यकता थी। खास तौर पर इसलिए कि आरोप स्वयं शराबबंदी पुलिस के अधिकारियों के खिलाफ थे।
मामला गौरी शंकर राम की याचिका से जुड़ा है, जिनका बेटा सोनोज कुमार 13 अगस्त 2025 से लापता है। याचिकाकर्ता के अनुसार सोनोज निर्माण स्थलों पर सेंटरिंग मिस्त्री का काम करता था।
परिवार के अनुसार 13 अगस्त की शाम सोनोज ने अपने छोटे भाई को फोन करके बताया कि धारहरा मुसहर टोली स्थित काली मंदिर के पास पुलिस ने उसे शराब पीने के आरोप में पकड़ लिया। कुछ समय बाद उसने दोबारा फोन कर बताया कि पुलिसकर्मी उसे पीट रहे हैं। इसके बाद फोन कट गया और उसका मोबाइल बंद हो गया।
परिवार ने बिहिया और जगदीशपुर थानों में उसकी तलाश की, लेकिन उसका कोई पता नहीं चला। अगले दिन सोनोज की मोटरसाइकिल धारहरा मुसहर टोली के पास लावारिस हालत में मिली।
इसके बाद उसके पिता ने शिकायत दर्ज कराई, जिसके आधार पर बिहिया थाना कांड संख्या 296/2025 दर्ज किया गया।
याचिका में स्थानीय लोगों के बयानों का भी हवाला दिया गया जिन्होंने कथित तौर पर सोनोज को पुलिसकर्मियों द्वारा पीटे जाते हुए देखा था।
आरोप है कि उसे इतनी बुरी तरह पीटा गया कि वह चलने की स्थिति में नहीं था। उसे पानी तक नहीं दिया गया और गले में गमछा बांधकर घसीटे जाने के बाद पुलिस वाहन में ले जाया गया।
याचिकाकर्ता ने यह भी दावा किया कि पास की एक निजी संपत्ति में लगे सीसीटीवी कैमरे में घटना रिकॉर्ड हुई थी। फुटेज में कथित तौर पर दो पुलिस वाहन मौके पर पहुंचते और पुलिसकर्मियों द्वारा कई लोगों को हिरासत में लेते तथा उनके साथ मारपीट करते हुए दिखाया गया।
मामला पहली बार मई में हाईकोर्ट के सामने आया था। तब अदालत ने भोजपुर के पुलिस अधीक्षक को व्यक्तिगत रूप से जांच की निगरानी करने का निर्देश दिया था।
बाद की सुनवाई में अदालत ने इस बात पर नाराजगी जताई कि एक महीने से अधिक समय बीत जाने के बावजूद राज्य की ओर से जवाबी हलफनामा तक दाखिल नहीं किया गया।
आगे की जांच में यह सामने आया कि सोनोज को दो अन्य लोगों के साथ हिरासत में लिया गया। शराबबंदी पुलिस के जिन अधिकारियों को गिरफ्तार कर पूछताछ की गई, उनके बयानों में कथित तौर पर लगातार बदलाव सामने आया।
पूछताछ के दौरान यह बात भी सामने आई कि सोनोज और शराबबंदी पुलिस के वाहन के निजी चालक के बीच कथित तौर पर हाथापाई हुई। आरोप है कि चालक ने सोनोज के गले में तौलिया डालकर उसे खींचा था।
मामले की सामग्री पर विचार करने के बाद खंडपीठ ने कहा कि उसे इस बात में “रत्ती भर भी संदेह नहीं” है कि FIR दर्ज होने के बाद राज्य की जांच एजेंसी ने आवश्यक तत्परता नहीं दिखाई।
अदालत ने विशेष रूप से इस तथ्य को गंभीर माना कि आरोप शराबबंदी पुलिस के अधिकारियों पर ही लगे थे। सोनोज को बेरहमी से पीटे जाने और उसके चलने में असमर्थ होने के आरोपों के बावजूद स्थानीय गवाहों के बयान उचित समय के भीतर दर्ज नहीं किए गए।
अदालत ने कहा,
“निष्क्रियता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है और याचिकाकर्ता के वकील का यह कहना कि चूंकि मामले में शराबबंदी पुलिस के अधिकारी शामिल थे, इसलिए जांच से समझौता हुआ है और उसमें पक्षपात हुआ है, उचित आधार पर आधारित है।”
खंडपीठ ने कहा कि इस मामले में राज्य की जांच एजेंसी की पूरी विश्वसनीयता दांव पर है। अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि आरोपियों में से दो सहायक अवर निरीक्षक थे, जो एक ही स्थान पर तैनात थे और जांच को प्रभावित करने की स्थिति में हो सकते थे।
हाईकोर्ट ने माना कि सामान्य परिस्थितियों में राज्य पुलिस से जांच लेकर CBI को सौंपना नियमित प्रक्रिया नहीं होनी चाहिए। हालांकि, वर्तमान मामले में राज्य की जांच पर भरोसा नहीं करने के “स्पष्ट और ठोस कारण” मौजूद हैं।
अदालत ने कहा कि मामले की निष्पक्ष जांच के लिए स्वतंत्र एजेंसी से जांच आवश्यक है खासकर तब जब एक व्यक्ति कथित तौर पर शराबबंदी पुलिस की हिरासत में लिए जाने के बाद से लापता है।
इसके बाद हाईकोर्ट ने बिहिया थाना कांड संख्या 296/2025 की जांच तत्काल प्रभाव से CBI को सौंपने का आदेश दिया। सीबीआई को निर्देश दिया गया कि वह मामले को “अत्यंत तत्परता” के साथ अपने हाथ में लेकर जांच आगे बढ़ाए।
अदालत ने CBI को राज्य पुलिस की पिछली जांच से जुड़े अधिकारियों से भी पूछताछ करने की स्वतंत्रता दी, ताकि यह पता लगाया जा सके कि मामला इतने लंबे समय तक लंबित क्यों रहा और जांच में प्रभावी प्रगति क्यों नहीं हुई।
CBI निदेशक को मामले की जांच के लिए अनुभवी अधिकारियों की टीम गठित करने का निर्देश दिया गया।
मामले की अगली सुनवाई 11 सितंबर 2026 को होगी। CBI को उस तारीख से पहले अब तक की कार्रवाई की रिपोर्ट हाईकोर्ट में दाखिल करनी होगी।


