धारा 65बी का प्रमाणपत्र नहीं तो व्हाट्सऐप मैसेज साक्ष्य में स्वीकार्य नहीं, मौखिक गवाही से कमी पूरी नहीं हो सकती: पटना हाईकोर्ट
Amir Ahmad
11 Aug 2026 4:12 PM IST

पटना हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के रूप में पेश किए गए व्हाट्सऐप मैसेज को भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65बी(4) के तहत अनिवार्य प्रमाणपत्र के बिना साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
अदालत ने स्पष्ट किया कि इस वैधानिक कमी को मौखिक गवाही के जरिए पूरा नहीं किया जा सकता।
जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस राणा विक्रम सिंह की खंडपीठ ने यह टिप्पणी उस मामले में की, जिसमें फैमिली कोर्ट ने पति द्वारा क्रूरता के आरोप के आधार पर विवाह विच्छेद की डिक्री पारित की थी।
हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का फैसला और विवाह विच्छेद की डिक्री रद्द करते हुए पति की याचिका खारिज की।
मामले में पति-पत्नी का विवाह फरवरी 2010 में हुआ था और दोनों की दो बेटियां हैं। पति ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ia) के तहत विवाह विच्छेद की मांग करते हुए पत्नी पर क्रूरता का आरोप लगाया था।
उसका कहना था कि पत्नी ने वैवाहिक संबंध बनाने से इनकार किया उसके और परिवार के सदस्यों के साथ अभद्र व्यवहार किया, छोटी-छोटी बातों पर झगड़ा किया और उसे तथा बच्चों को परिवार से अलग करने का प्रयास किया।
पति ने अपने आरोपों के समर्थन में कुछ व्हाट्सऐप मैसेज भी अदालत के सामने पेश किए।
लखीसराय की फैमिली कोर्ट ने पति के मुकदमे को स्वीकार करते हुए विवाह विच्छेद की डिक्री पारित की। इसके खिलाफ पत्नी ने पटना हाईकोर्ट में अपील की।
मामले की दोबारा जांच करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि पति द्वारा बताए गए कथित घटनाक्रम अलग-अलग वर्षों में हुए बताए गए थे लेकिन उनके समय, स्थान और परिस्थितियों का पर्याप्त विवरण नहीं दिया गया।
पति की ओर से पेश गवाहों ने भी पत्नी के कथित “दुर्व्यवहार”, “गंदी भाषा” और “क्रूर व्यवहार” के बारे में सामान्य बयान दिए लेकिन ऐसे ठोस विवरण नहीं दिए जिनसे अदालत कथित आचरण की गंभीरता का आकलन कर सके।
इसके बाद खंडपीठ ने पति द्वारा साक्ष्य के रूप में पेश किए गए व्हाट्सऐप मैसेज पर विचार किया। इन्हें प्रदर्श-1 के रूप में पेश किया गया था। अदालत ने पाया कि इन इलेक्ट्रॉनिक संदेशों के साथ भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65बी(4) के तहत आवश्यक प्रमाणपत्र प्रस्तुत नहीं किया गया।
सुप्रीम कोर्ट के अर्जुन पंडित्राव खोटकर बनाम कैलाश कुशनराव गोरंट्याल के फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों की स्वीकार्यता के लिए धारा 65बी(4) का प्रमाणपत्र अनिवार्य है।
अदालत ने स्पष्ट किया,
“मौखिक साक्ष्य इस कमी को पूरा नहीं कर सकता। वैधानिक प्रमाणपत्र के अभाव में व्हाट्सऐप संदेश पूरी तरह अस्वीकार्य हैं और किसी भी उद्देश्य के लिए उन पर विचार नहीं किया जा सकता।”
हाईकोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि पति-पत्नी वर्ष 2010 से 2018 के बीच लंबे समय तक साथ रहे थे और उनके दो बच्चे भी हुए।
पति ने वर्ष 2018 से पहले दोनों के बीच कभी-कभार शारीरिक संबंध होने की बात भी स्वीकार की थी। इसके अलावा जून 2022 में परामर्श के बाद दोनों ने कुछ समय के लिए फिर साथ रहना शुरू किया था।
अदालत ने कहा कि जब व्हाट्सऐप मैसेज को साक्ष्य से बाहर कर दिया जाता है तो पति का मामला मूल रूप से एक पक्ष के कथन को दूसरे पक्ष के कथन के सामने रखने तक सीमित रह जाता है। पति की गवाही भी अस्पष्ट थी और उसे स्वीकार्य दस्तावेजी साक्ष्य का पर्याप्त समर्थन नहीं है।
खंडपीठ ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ia) के तहत विवाह विच्छेद के लिए क्रूरता ऐसी होनी चाहिए, जिसकी “गंभीरता, तीव्रता और निरंतरता” कानून द्वारा अपेक्षित स्तर तक पहुंचती हो। मौजूदा मामले में पति इन आवश्यक तत्वों को साबित करने में विफल रहा।
हाईकोर्ट ने अंततः फैमिली कोर्ट के फैसले और विवाह विच्छेद की डिक्री को रद्द कर दिया तथा पति द्वारा दायर विवाह विच्छेद का मुकदमा खारिज किया।


