लापरवाही और खामियों से भरी जांच का उदाहरण: पटना हाईकोर्ट ने हत्या के दोषी को बरी किया, जांच अधिकारी के खिलाफ जांच के आदेश

Amir Ahmad

6 July 2026 5:14 PM IST

  • लापरवाही और खामियों से भरी जांच का उदाहरण: पटना हाईकोर्ट ने हत्या के दोषी को बरी किया, जांच अधिकारी के खिलाफ जांच के आदेश

    पटना हाईकोर्ट ने हत्या के एक मामले में दोषी ठहराए गए व्यक्ति को बरी करते हुए पुलिस जांच पर कड़ी टिप्पणी की।

    अदालत ने कहा कि यह मामला अनुचित, लापरवाहीपूर्ण और उदासीन जांच का एक क्लासिक उदाहरण है। साथ ही जांच में गंभीर चूक पाए जाने पर संबंधित जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच कराने का भी निर्देश दिया।

    जस्टिस बिबेक चौधरी और जस्टिस राणा विक्रम सिंह की खंडपीठ एडिशनल सेशन जज, मधेपुरा के उस फैसले के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें आरोपी को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302/34 तथा शस्त्र अधिनियम की धारा 27 के तहत दोषी ठहराया गया था।

    मामले के गुण-दोष पर विचार करने से पहले ही हाईकोर्ट ने कहा,

    "यह अपील जांच अधिकारी द्वारा की गई अनुचित, लापरवाहीपूर्ण और उदासीन जांच का क्लासिक उदाहरण है, जिसने अभियोजन के मामले में गंभीर खामियां छोड़ दीं।"

    अभियोजन के अनुसार, 22 जुलाई, 2014 को सूचनाकर्ता अपने बेटे के साथ एक रिश्तेदार के अंतिम संस्कार से मोटरसाइकिल पर लौट रहा था। रास्ते में कुछ लोगों ने उन्हें रोक लिया और आरोप है कि एक आरोपी के कहने पर अपीलकर्ता ने सूचनाकर्ता के बेटे के सीने में गोली मार दी। इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। जांच के बाद आरोपपत्र दाखिल किया गया।

    निचली अदालत ने मुख्य रूप से एक प्रत्यक्षदर्शी गवाह के बयान के आधार पर आरोपी को दोषी ठहराया। हालांकि, हाईकोर्ट ने साक्ष्यों का स्वतंत्र मूल्यांकन करते हुए पाया कि अभियोजन के मामले में कई गंभीर कमियां हैं।

    अदालत ने कहा कि जिस सूचनाकर्ता ने स्वयं को प्रत्यक्षदर्शी बताते हुए FIR दर्ज कराई थी, उसने मुकदमे के दौरान अभियोजन का साथ नहीं दिया और आरोपी के खिलाफ कोई आरोप नहीं लगाया। इसके बावजूद अभियोजन ने उसे शत्रुतापूर्ण गवाह घोषित नहीं किया।

    हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि अभियोजन के कथित प्रत्यक्षदर्शी के मुख्य परीक्षण और जिरह में महत्वपूर्ण विरोधाभास हैं। ऐसे में उसे पूरी तरह विश्वसनीय गवाह नहीं माना जा सकता।

    अदालत ने कहा कि केवल ऐसे साक्ष्य के आधार पर आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

    हाईकोर्ट ने जांच में कई गंभीर खामियों की ओर भी ध्यान दिलाया। अदालत ने पाया कि घटनास्थल से एक मोटरसाइकिल, एक सैमसंग मोबाइल फोन और एक खाली कारतूस बरामद किया गया, लेकिन जांच अधिकारी ने न तो मोटरसाइकिल और मोबाइल के मालिक का पता लगाया और न ही खाली कारतूस को फोरेंसिक जांच के लिए भेजा, ताकि यह पता चल सके कि वह कथित हथियार से चलाया गया था, या नहीं।

    अदालत ने कहा,

    "ऐसे मामले की जांच में यह जांच अधिकारी का प्राथमिक कर्तव्य था। ऐसा प्रतीत होता है कि या तो जांच अधिकारी को जांच के बुनियादी सिद्धांतों की जानकारी नहीं थी या फिर उसने जानबूझकर ऐसे साक्ष्य सामने नहीं आने दिए, जो जांच के दौरान प्राप्त किए जा सकते थे।"

    खंडपीठ ने यह भी नोट किया कि जब्ती सूची के गवाहों से मुकदमे के दौरान उनके हस्ताक्षरों के संबंध में कोई सवाल नहीं किया गया। एक गवाह ने तो यहां तक कहा कि जांच अधिकारी के कहने पर उसने कोरे कागज पर हस्ताक्षर किए।

    इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन आरोपी का अपराध संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है।

    अदालत ने दोषसिद्धि और सजा दोनों को रद्द करते हुए आरोपी को बरी किया।

    साथ ही, जांच में पाई गई गंभीर लापरवाही को देखते हुए संबंधित जांच अधिकारी के खिलाफ जांच शुरू करने का भी निर्देश दिया।

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