2011 की सीधी नियुक्ति को बाद में कार्यकाल आधारित नहीं बनाया जा सकता: पटना हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालय का फैसला रद्द किया
Amir Ahmad
4 July 2026 3:42 PM IST

पटना हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि बिहार कृषि विश्वविद्यालय अधिनियम के तहत वर्ष 2010 में बनाए गए उपबंध, जिन्हें वर्ष 2017 में अधिसूचित किया गया, उन्हें पूर्व प्रभाव से लागू कर वर्ष 2011 में सीधी भर्ती के जरिए हुई स्थायी नियुक्ति को कार्यकाल आधारित नियुक्ति में नहीं बदला जा सकता। अदालत ने कहा कि जब तक किसी कानून में स्पष्ट रूप से या आवश्यक रूप से पूर्व प्रभाव से लागू होने का प्रावधान न हो, तब तक उसे भविष्य के लिए ही प्रभावी माना जाएगा, विशेषकर तब जब उससे कर्मचारियों के अर्जित सेवा अधिकार प्रभावित होते हों।
जस्टिस आलोक कुमार सिन्हा ने यह फैसला उस याचिका पर सुनाया, जिसमें बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर के निदेशक (प्रसार शिक्षा) पद से याचिकाकर्ता को पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा होने का आधार बनाकर हटाने और कथित समकक्ष पद पर भेजने संबंधी कार्यालय आदेशों को चुनौती दी गई।
याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि उनकी प्रारंभिक नियुक्ति वर्ष 1991 में कनिष्ठ वैज्ञानिक-सहायक प्राध्यापक के पद पर हुई थी। इसके बाद उन्हें क्रमशः वरिष्ठ वैज्ञानिक-सह-एसोसिएट प्रोफेसर और विश्वविद्यालय प्रोफेसर-सह-मुख्य वैज्ञानिक के पद पर पदोन्नति मिली। वर्ष 2011 में जारी विज्ञापन के आधार पर नियमित चयन प्रक्रिया से गुजरने के बाद 14 दिसंबर, 2011 को उनकी सीधी भर्ती के माध्यम से निदेशक (प्रसार शिक्षा) पद पर नियुक्ति हुई।
उन्होंने दलील दी कि न तो वर्ष 2011 के विज्ञापन में और न ही नियुक्ति अधिसूचना में इस पद को कार्यकाल आधारित बताया गया। साथ ही उस समय वर्ष 2010 के विश्वविद्यालय उपबंध लागू भी नहीं हुए। उस अवधि में पूर्ववर्ती राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय के उपबंध लागू थे, जिनमें निदेशक (प्रसार शिक्षा) का पद कार्यकाल आधारित नहीं था।
याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि कार्यभार ग्रहण करते समय किए गए अनुबंध में केवल विश्वविद्यालय के नियमों और उपबंधों का पालन करने की शर्त थी। इसका अर्थ यह नहीं था कि उनकी स्थायी नियुक्ति को बाद में कार्यकाल आधारित नियुक्ति में बदला जा सकता है।
विश्वविद्यालय की ओर से दलील दी गई कि याचिका सुनवाई योग्य नहीं है, क्योंकि याचिकाकर्ता ने केवल कार्यालय आदेशों को चुनौती दी, प्रबंधन बोर्ड के मूल निर्णय को नहीं। यह भी कहा गया कि उनके पास कुलाधिपति के समक्ष वैकल्पिक वैधानिक उपाय उपलब्ध था।
हाईकोर्ट ने इन आपत्तियों को खारिज करते हुए कहा कि जब कार्यालय आदेश चुनौती के दायरे में हैं तो उनके आधार बने प्रबंधन बोर्ड के निर्णय की वैधता की भी जांच की जा सकती है।
मामले के गुण-दोष पर विचार करते हुए अदालत ने पाया कि वर्ष 2011 के विज्ञापन और 14 दिसंबर, 2011 की नियुक्ति अधिसूचना में कहीं भी यह नहीं कहा गया कि निदेशक (प्रसार शिक्षा) का पद कार्यकाल आधारित है। इसके विपरीत, अधिसूचना में स्पष्ट रूप से उल्लेख था कि नियुक्ति सीधी भर्ती के माध्यम से की गई।
अदालत ने कहा,
"भविष्य में सेवा नियमों में होने वाले संशोधनों का पालन करने संबंधी सामान्य शर्त का यह अर्थ नहीं निकाला जा सकता कि उससे नियुक्ति की मूल प्रकृति को पूर्व प्रभाव से बदला जा सकता है, जब तक कि कानून में इसका स्पष्ट प्रावधान न हो।"
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि वर्ष 2010 के उपबंध वर्ष 2017 में राजपत्र में प्रकाशित होने के बाद ही प्रभावी हुए और उनमें पहले से की गई नियुक्तियों पर पूर्व प्रभाव से लागू होने का कोई प्रावधान नहीं है। अदालत के अनुसार, संबंधित प्रावधान केवल भविष्य में होने वाली निदेशकों और अधिष्ठाताओं की नियुक्तियों की प्रक्रिया तय करता है, न कि पहले से की गई नियुक्तियों को कार्यकाल आधारित घोषित करता है।
अदालत ने यह भी पाया कि विश्वविद्यालय यह साबित नहीं कर सका कि याचिकाकर्ता को जिस पद पर भेजा गया, वह वास्तव में समकक्ष पद था। साथ ही, उनका पूर्व पद पर अधिकार पहले ही समाप्त हो चुका था और उन्हें सुनवाई का अवसर दिए बिना आदेश पारित कर दिए गए, जबकि इससे उनके अधिकारों पर गंभीर प्रभाव पड़ता था।
इन तथ्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने प्रबंधन बोर्ड के उस निर्णय और 19 सितंबर, 2025 के कार्यालय आदेशों को रद्द कर दिया, जिनके तहत याचिकाकर्ता को पद से हटाया गया। अदालत ने विश्वविद्यालय को निर्देश दिया कि दो महीने के भीतर याचिकाकर्ता को निदेशक (प्रसार शिक्षा) के पद पर बहाल किया जाए तथा सेवा की निरंतरता और सभी परिणामी सेवा लाभ प्रदान किए जाएं।


