विशेषज्ञ समिति के तकनीकी मूल्यांकन में अदालतें दखल नहीं दे सकतीं, जब तक दुर्भावना या स्पष्ट मनमानी साबित न हो: पटना हाईकोर्ट
Amir Ahmad
25 Jun 2026 1:11 PM IST

पटना हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत न्यायिक समीक्षा करते समय अदालतें विशेषज्ञ निविदा समितियों द्वारा किए गए तकनीकी पात्रता मूल्यांकन का दोबारा आकलन नहीं कर सकतीं। केवल तब हस्तक्षेप किया जा सकता है, जब निर्णय दुर्भावनापूर्ण, मनमाना या स्पष्ट रूप से विकृत एवं अवैध साबित हो।
जस्टिस सुधीर सिंह और जस्टिस रंजन कुमार झा की खंडपीठ एक संयुक्त उद्यम द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
याचिका में लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग की विभिन्न निविदाओं में याचिकाकर्ता को तकनीकी रूप से सफल घोषित करने तथा उसकी वित्तीय बोलियों पर विचार करने का निर्देश देने की मांग की गई।
याचिकाकर्ता संयुक्त उद्यम, जिसमें उमाकांत सिंह और एक निजी निर्माण कंपनी शामिल थी, ने किशनगंज, फारबिसगंज और कटिहार से संबंधित निविदाओं में भाग लिया था। उसकी तकनीकी बोलियां संयुक्त उद्यम से जुड़े कुछ प्रावधानों और पात्रता शर्तों का पालन नहीं करने के आधार पर अस्वीकार की गई थीं।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि सभी आवश्यक दस्तावेज अपलोड किए गए और एक निविदा में उसकी बोली केवल इस आधार पर खारिज की गई कि संयुक्त उद्यम समझौते का प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट से सत्यापन नहीं कराया गया, जबकि ऐसी कोई शर्त निविदा दस्तावेजों में नहीं थी। अन्य निविदाओं के संबंध में भी उसका कहना था कि संयुक्त उद्यम के दोनों साझेदार मिलकर अनुभव संबंधी सभी शर्तों को पूरा करते थे।
वहीं, राज्य की ओर से कहा गया कि याचिकाकर्ता निविदा दस्तावेज में निर्धारित पात्रता मानदंडों को पूरा नहीं करता था। तकनीकी जांच के दौरान यह पाया गया कि संयुक्त उद्यम के लिए निर्धारित आवश्यक शर्तों का पालन नहीं किया गया।
सुनवाई के दौरान एक जांच समिति की रिपोर्ट का भी उल्लेख किया गया, जिसमें कुछ निविदाकारों के साथ तकनीकी मूल्यांकन में समान व्यवहार नहीं किए जाने की बात कही गई और पूरी निविदा प्रक्रिया रद्द कर नई निविदाएं जारी करने की सिफारिश की गई।
हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि केवल इस कारण कि जांच समिति ने निविदा प्रक्रिया रद्द करने और नई निविदा जारी करने की सिफारिश की थी, यह नहीं माना जा सकता कि याचिकाकर्ता पात्रता शर्तें पूरी करता था या उसे गलत तरीके से अयोग्य घोषित किया गया।
खंडपीठ ने कहा,
“जब तक किसी निर्णय को मनमाना, दुर्भावनापूर्ण या स्पष्ट रूप से विकृत साबित नहीं किया जाता, तब तक अदालतें निविदा मूल्यांकन समिति के आकलन की जगह अपना आकलन नहीं थोप सकतीं।”
अदालत ने पाया कि निविदा मूल्यांकन समिति ने याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों की जांच के बाद निष्कर्ष निकाला था कि आवश्यक पात्रता शर्तें पूरी नहीं हुई थीं। यह निर्णय विशेषज्ञ निकाय द्वारा लिया गया और अदालत उसके गुण-दोष पर पुनर्विचार नहीं कर सकती।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि संविदात्मक मामलों में न्यायिक समीक्षा का दायरा सीमित होता है।
अदालत का काम निर्णय लेने की प्रक्रिया की वैधता जांचना है, न कि विशेषज्ञों के तकनीकी निष्कर्षों का पुनर्मूल्यांकन करना।
पीठ ने कहा,
“केवल इस कारण कि कोई पक्ष विशेषज्ञ निकाय के निष्कर्ष से असहमत है, अदालत को बोली दस्तावेजों का नया मूल्यांकन करने का अधिकार नहीं मिल जाता।”
रिकॉर्ड पर दुर्भावना, मनमानी या स्पष्ट कानूनी त्रुटि का कोई प्रमाण न मिलने पर हाइकोर्ट ने याचिका खारिज की और याचिकाकर्ता की तकनीकी अयोग्यता में हस्तक्षेप करने से इनकार किया।

