'बैड वर्क' जैसे अस्पष्ट शब्दों से प्रवेशात्मक यौन उत्पीड़न नहीं माना जा सकता: पटना हाईकोर्ट ने POCSO दोषसिद्धि आंशिक रूप से रद्द की
Amir Ahmad
28 April 2026 3:43 PM IST

पटना हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय में कहा कि केवल 'बैड वर्क' जैसे अस्पष्ट शब्दों के आधार पर बिना स्पष्ट प्रत्यक्षदर्शी या मेडिकल साक्ष्य के प्रवेशात्मक यौन उत्पीड़न मान लेना विधिसम्मत नहीं है।
अदालत ने कहा कि ऐसे सामान्य शब्दों से स्वतः यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि POCSO Act के तहत प्रवेशात्मक यौन उत्पीड़न हुआ।
जस्टिस बिबेक चौधुरी और जस्टिस चंद्रशेखर झा की खंडपीठ आपराधिक अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें विशेष POCSO अदालत, मुंगेर द्वारा 2 अगस्त, 2018 को सुनाई गई दोषसिद्धि और सजा को चुनौती दी गई।
ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376(i) तथा POCSO Act की धाराओं 4, 8 और 12 के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
अभियोजन के अनुसार घटना 18 जून 2018 की, जब 8 वर्षीय पीड़िता घर में अकेली थी। आरोप है कि पड़ोसी आरोपी घर में घुसा, बच्ची की पैंट नीचे की और उसके साथ बैड वर्क किया।
अपीलकर्ता ने दावा किया कि पड़ोस के विवाद के कारण उसे झूठा फंसाया गया। उसका कहना था कि मेडिकल साक्ष्य प्रवेश के आरोप का समर्थन नहीं करते और ट्रायल कोर्ट ने केवल अस्पष्ट बयान तथा कपड़ों पर वीर्य मिलने के आधार पर गलत निष्कर्ष निकाला।
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड की जांच करने के बाद पाया कि मेडिकल रिपोर्ट प्रवेशात्मक कृत्य की पुष्टि नहीं करती। अदालत ने कहा कि पीड़िता के शरीर पर ऐसे मेडिकल संकेत नहीं मिले, जो प्रवेश का समर्थन करें।
अदालत ने यह भी माना कि केवल कपड़ों पर वीर्य पाए जाने से प्रवेशात्मक यौन उत्पीड़न सिद्ध नहीं होता।
हाईकोर्ट ने कहा,
“'बैड वर्क' एक सामान्य अभिव्यक्ति है। इसे बिना प्रत्यक्ष या मेडिकल पुष्टिकरण के प्रवेशात्मक यौन उत्पीड़न नहीं माना जा सकता।”
अदालत ने माना कि ट्रायल कोर्ट द्वारा वीर्य की उपस्थिति को प्रवेश का पर्याप्त आधार मानना विधिक रूप से टिकाऊ नहीं है। इसके चलते हाईकोर्ट ने आरोपी की IPC की धारा 376(आई) तथा POCSO Act की धाराओं 4 और 12 के तहत दोषसिद्धि निरस्त की।
हालांकि पीड़िता के सुसंगत बयान और घटना की प्रकृति को देखते हुए अदालत ने POCSO Act की धारा 8 के तहत यौन उत्पीड़न की दोषसिद्धि बरकरार रखी। हाईकोर्ट ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों से यौन उत्पीड़न का अपराध सिद्ध होता है लेकिन प्रवेशात्मक यौन उत्पीड़न का नहीं।

