आखिरी बार आरोपियों के साथ दिखी बच्ची, 10 घंटे में मिला शव: पटना हाईकोर्ट ने दुष्कर्म-हत्या मामले में उम्रकैद बरकरार रखी

Amir Ahmad

6 May 2026 12:54 PM IST

  • आखिरी बार आरोपियों के साथ दिखी बच्ची, 10 घंटे में मिला शव: पटना हाईकोर्ट ने दुष्कर्म-हत्या मामले में उम्रकैद बरकरार रखी

    पटना हाईकोर्ट ने आठ वर्षीय बच्ची के दुष्कर्म और हत्या मामले में दो दोषियों की सजा बरकरार रखते हुए कहा कि जब अभियोजन यह साबित कर दे कि पीड़िता आखिरी बार आरोपियों के साथ देखी गई थी और कुछ ही घंटों बाद उसका शव बरामद हुआ तो ऐसी स्थिति में आरोपियों पर यह दायित्व आ जाता है कि वे मृत्यु के संबंध में स्पष्टीकरण दें।

    जस्टिस बिबेक चौधुरी और जस्टिस अंसुल की खंडपीठ ने मुजफ्फरपुर की स्पेशल POCSO कोर्ट द्वारा 2018 में सुनाई गई दोषसिद्धि और सजा के आदेश के खिलाफ दायर अपील खारिज करते हुए यह फैसला दिया।

    दोनों आरोपियों को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376(ए), 302, 34 तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम (SC/ST Act) के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा दी गई।

    अभियोजन के अनुसार 14 फरवरी, 2017 की रात लगभग 10 बजे आरोपी जबरन पीड़िता के घर में घुसे और उसका मुंह दबाकर उसे कंधे पर उठाकर ले गए। बच्ची के माता-पिता ने शोर मचाया और पूरी रात तलाश की लेकिन उसका पता नहीं चला। अगले दिन पास के खेत से बच्ची का शव बरामद हुआ।

    हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन के गवाहों की क्रॉस एग्जामिनेशन के दौरान बचाव पक्ष ने इस महत्वपूर्ण तथ्य को प्रभावी ढंग से चुनौती नहीं दी कि बच्ची को आरोपी अपने साथ ले गए। अदालत ने पाया कि इस पहलू पर गवाहों की गवाही अप्रतिहत रही।

    खंडपीठ ने कहा कि मामले में लास्ट सीन यानी आखिरी बार पीड़िता को आरोपियों के साथ देखे जाने की परिस्थिति स्पष्ट रूप से स्थापित हुई। अदालत ने माना कि बच्ची को ले जाए जाने और शव मिलने के बीच लगभग 10 घंटे का अंतर था, जो इतना कम है कि किसी तीसरे व्यक्ति के हस्तक्षेप की संभावना लगभग समाप्त हो जाती है।

    अदालत ने कहा कि साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 के अनुसार जब कोई तथ्य विशेष रूप से आरोपी के ज्ञान में हो तो उसका स्पष्टीकरण देना आरोपी का दायित्व है। खंडपीठ ने टिप्पणी की कि ऐसी परिस्थितियों में यदि आरोपी यह नहीं बताते कि पीड़िता की मृत्यु कैसे हुई तो अदालत उनके विरुद्ध प्रतिकूल अनुमान लगाने के लिए पूर्णतः न्यायसंगत है।

    हाईकोर्ट ने यह भी नोट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 313 के तहत पूछताछ के दौरान आरोपियों से इस बारे में प्रश्न किए गए लेकिन उन्होंने कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दिया और न ही बचाव में कोई साक्ष्य पेश किया।

    इन परिस्थितियों में अदालत ने माना कि अभियोजन ने संदेह से परे अपना मामला सिद्ध किया और ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई दोषसिद्धि तथा सजा में कोई त्रुटि नहीं है।

    इसी आधार पर हाईकोर्ट ने अपील खारिज की और दोषियों की उम्रकैद की सजा बरकरार रखी।

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