जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करने के बाद नई अनुशासनात्मक जांच अनुचित: पटना हाईकोर्ट
Amir Ahmad
24 March 2025 8:32 AM

पटना हाईकोर्ट की जस्टिस अरविंद सिंह चंदेल की एकल पीठ ने बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण और अपील) नियम, 2005 के तहत सरकारी कर्मचारी के खिलाफ नई अनुशासनात्मक जांच के आदेश को अनुचित पाते हुए खारिज कर दिया।
अदालत ने कहा कि जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करने के बाद अनुशासनात्मक प्राधिकारी के पास सीमित विकल्प होते हैं। वह नए सिरे से जांच शुरू नहीं कर सकता। अदालत ने अनुशासनात्मक प्राधिकारी को दो सप्ताह के भीतर नया आदेश पारित करने का निर्देश दिया।
मामला
प्रद्युम्न कुमार प्रसाद को जिला कल्याण कार्यालय, पश्चिम चंपारण में नाजिर के रूप में नियुक्त किया गया। उनके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया गया और अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू की गई। जांच पूरी करने के बाद अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने अनिवार्य रिटायरमेंट का आदेश पारित किया। उनसे 37,41,060 रुपये की वसूली का निर्देश दिया। व्यथित होकर प्रसाद ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
न्यायालय ने सजा रद्द की और मामले को अनुशासनात्मक प्राधिकारी को वापस भेज दिया। हालांकि, अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने वही आदेश पारित किया। प्रसाद ने फिर से हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। न्यायालय ने पाया कि आरोप ज्ञापन बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण और अपील) नियम, 2005 ('2005 नियम') के नियम 17(4) का उल्लंघन करता है, क्योंकि इसमें आरोप के कथन की सूची, दस्तावेजों की सूची और गवाहों की सूची का अभाव था।
इसके बाद प्रसाद को वही दोषपूर्ण आरोप ज्ञापन जारी किया गया। अपने जवाब में उन्होंने विशेष रूप से उल्लेख किया कि आरोप ज्ञापन 2005 के नियमों के अनुसार नहीं था और हाईकोर्ट के आदेश का उल्लंघन करता था। इसके बावजूद, एक नई जांच शुरू की गई, जिससे वर्तमान याचिका को बढ़ावा मिला।
तर्क
प्रसाद ने प्रस्तुत किया कि एक बार जांच अधिकारी 2005 के नियमों के नियम 18 के तहत रिपोर्ट प्रस्तुत करता है तो अनुशासनात्मक प्राधिकारी को या तो इसे स्वीकार करना चाहिए, इससे असहमत होना चाहिए, या कारणों के साथ आगे की जांच का निर्देश देना चाहिए। इसके बजाय, इस मामले में उन्हीं आरोपों को शामिल करते हुए नया आरोप ज्ञापन प्रस्तुत किया गया, जिसके लिए जांच रिपोर्ट पहले ही प्रस्तुत की जा चुकी थी। उन्होंने तर्क दिया कि यह एक नए सिरे से जांच के बराबर है, जो नियमों के तहत स्वीकार्य नहीं है। प्रसाद ने आगे तर्क दिया कि यह मुकदमेबाजी का तीसरा दौर था और वह पहले ही सेवा से सेवानिवृत्त हो चुके थे।
अदालत का तर्क
सबसे पहले अदालत ने अपने पहले के आदेश की जांच की, जिसमें पाया गया कि आरोप ज्ञापन 2005 के नियमों के नियम 17(4) का अनुपालन नहीं करने के कारण दोषपूर्ण था। इसने नोट किया कि इस आदेश के बाद प्रसाद को फिर से वही आरोप पत्र जारी किया गया।
दूसरे अदालत ने बिहार राज्य बनाम मोहम्मद शमीम अख्तर (एलपीए नंबर 1653, 2016) का हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि जांच रिपोर्ट प्राप्त करने के बाद अनुशासनात्मक प्राधिकारी के पास सीमित विकल्प होते हैं या तो निष्कर्षों को स्वीकार करें या अस्वीकार करें या यदि आप असहमत हैं तो कारण बताओ नोटिस जारी करें और मामले को जांच के लिए वापस भेजें। महत्वपूर्ण बात यह है कि न्यायालय ने कहा कि अनुशासनात्मक प्राधिकारी इस स्तर पर आरोपों में संशोधन नहीं कर सकता या नई जांच का आदेश नहीं दे सकता।
इसके अलावा, अशोक कुमार बनाम बिहार राज्य (सीडब्ल्यूजेसी-16086/2021) का हवाला देते हुए न्यायालय ने माना कि नियमों के तहत कोई भी प्रावधान दूसरी विभागीय जांच की परिकल्पना नहीं करता। इसने फैसला सुनाया कि यदि दोष पाए जाते हैं तो मामले को नियम 18(1) के तहत आगे की जांच के लिए जांच प्राधिकारी को वापस भेजा जा सकता है। इस प्रकार, न्यायालय ने फैसला सुनाया कि जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करने के बाद अनुशासनात्मक प्राधिकारी के पास नई जांच शुरू करने का कोई अधिकार नहीं है।
परिणामस्वरूप, न्यायालय ने रिट याचिका को अनुमति दे दी। इसने मामले को 2005 के नियमों के नियम 18(1) के अनुसार नया आदेश पारित करने के लिए अनुशासनात्मक प्राधिकारी को वापस भेज दिया। न्यायालय ने अनुशासनात्मक प्राधिकारी को दो सप्ताह के भीतर आदेश पारित करने का निर्देश दिया।