पुस्तकालयाध्यक्षों के खाली पद शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर संकट: पटना हाईकोर्ट

Amir Ahmad

21 May 2026 1:03 PM IST

  • पुस्तकालयाध्यक्षों के खाली पद शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर संकट: पटना हाईकोर्ट

    पटना हाईकोर्ट ने बिहार के विश्वविद्यालयों में लाइब्रेरियन, डिप्टी लाइब्रेरियन और असिस्टेंट लाइब्रेरियन के बड़ी संख्या में खाली पड़े पदों पर गंभीर चिंता जताई है।

    अदालत ने कहा कि पुस्तकालयाध्यक्षों की अनुपस्थिति से विश्वविद्यालयों की शैक्षणिक व्यवस्था पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है और पुस्तकालयों का संचालन लगभग ठप हो चुका है।

    चीफ जस्टिस संगम कुमार साहू और जस्टिस हरीश कुमार की खंडपीठ इस मामले पर सुनवाई कर रही थी।

    अदालत ने शुरुआत में ही कहा कि पुस्तकालय किसी भी शैक्षणिक संस्थान का जीवंत और केंद्रीय हिस्सा होते हैं, जो छात्रों की पढ़ाई, शोध, रचनात्मकता और कौशल विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

    हाईकोर्ट ने कहा,

    “लाइब्रेरियन के बिना छात्र और शिक्षक सही दिशा देने वाले मार्गदर्शकों से वंचित हो जाते हैं। यह मामला इसी गंभीर समस्या से जुड़ा है।”

    सुनवाई के दौरान मुंगेर विश्वविद्यालय, पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय, पटना विश्वविद्यालय, मगध विश्वविद्यालय और ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय समेत कई विश्वविद्यालयों के कुलपति वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अदालत के समक्ष उपस्थित हुए और रिक्त पदों की जानकारी दी।

    मुंगेर विश्वविद्यालय ने अदालत को बताया कि लाइब्रेरियन के सभी 17 स्वीकृत पद खाली हैं। वहीं पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय ने कहा कि उसके यहां लाइब्रेरियन के 21 स्वीकृत पद रिक्त पड़े हैं। मौलाना मजहरुल हक अरबी एवं फारसी विश्वविद्यालय ने भी जानकारी दी कि उसका एकमात्र स्वीकृत लाइब्रेरियन पद भी खाली है।

    रिक्तियों की स्थिति पर चिंता जताते हुए हाईकोर्ट ने कहा,

    “लगभग सभी विश्वविद्यालयों में लाइब्रेरियन, डिप्टी लाइब्रेरियन और असिस्टेंट लाइब्रेरियन के अधिकांश पद खाली हैं, जिसके कारण पुस्तकालयों का समुचित संचालन अस्थायी रूप से ठप हो गया। इससे छात्रों के भविष्य, करियर और विश्वविद्यालयों के शैक्षणिक वातावरण पर गंभीर असर पड़ रहा है।”

    अदालत ने पाया कि कुछ विश्वविद्यालयों ने रोस्टर स्वीकृति की प्रक्रिया शुरू की, जबकि कुछ ने उच्च शिक्षा निदेशक को रिक्तियों की जानकारी भेज दी है, लेकिन नियुक्तियों को लेकर अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।

    हाईकोर्ट ने सभी कुलपतियों को निर्देश दिया कि लंबित रोस्टर स्वीकृति की प्रक्रिया शीघ्र पूरी कर रिक्त पदों की मांग निर्धारित समय सीमा में उच्च शिक्षा निदेशक को भेजी जाए। साथ ही संबंधित मंडलीय आयुक्तों को भी निर्देश दिया गया कि रिक्तियों का विवरण मिलने के दो सप्ताह के भीतर रोस्टर स्वीकृति की प्रक्रिया पूरी करें।

    खंडपीठ ने कहा कि लाइब्रेरियन केवल प्रशासनिक कर्मचारी नहीं बल्कि विश्वविद्यालय की बौद्धिक पूंजी के संरक्षक होते हैं।

    अदालत ने कहा,

    “लाइब्रेरियन का पद खाली रहना केवल प्रशासनिक देरी नहीं है, बल्कि यह छात्रों को सुलभ ज्ञान उपलब्ध कराने की विश्वविद्यालय की मूल जिम्मेदारी के निलंबन जैसा है।”

    हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि आधुनिक लाइब्रेरियन सूचना विज्ञान के विशेषज्ञ की तरह काम करते हैं, जो छात्रों को “सर्च और रिसर्च” के अंतर को समझाने के साथ-साथ स्रोतों की विश्वसनीयता परखने में मदद करते हैं।

    अदालत ने स्पष्ट किया कि विश्वविद्यालयों में लाइब्रेरियन के पद खाली रहना केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि संस्थानों की “शैक्षणिक सेहत” और व्यवस्था के टूटने जैसा है।

    हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि लाइब्रेरियन की कमी से पुस्तक संग्रहों का रखरखाव प्रभावित होता है, शोध सेवाएं बाधित होती हैं, जर्नल और डाटाबेस प्रबंधन कमजोर पड़ता है तथा पुस्तकालयों में सामग्री संरक्षण और संग्रह विकास की प्रक्रिया भी प्रभावित होती है।

    अंत में अदालत ने सुनवाई में सहयोग देने के लिए सभी कुलपतियों और विश्वविद्यालय अधिकारियों की सराहना भी की।

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