Bihar Prohibition Act | सुप्रीम कोर्ट ने ब्रेथ एनालाइजर टेस्ट को अंतिम प्रमाण नहीं कहा: पटना हाईकोर्ट की स्पष्टता, राज्य की अपील खारिज
Amir Ahmad
6 April 2026 6:05 PM IST

पटना हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट ने कभी यह नहीं कहा कि ब्रेथ एनालाइजर टेस्ट शराब सेवन का निर्णायक (अंतिम) प्रमाण नहीं है। साथ ही अदालत ने राज्य की अपील खारिज करते हुए पुलिस अधिकारी की बर्खास्तगी रद्द करने का आदेश बरकरार रखा।
चीफ जस्टिस संगम कुमार साहू और जस्टिस हरीश कुमार की खंडपीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी। मामला एक सब-इंस्पेक्टर की बर्खास्तगी से जुड़ा था, जिस पर ड्यूटी के दौरान शराब पीने का आरोप था और उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की गई।
राज्य का मामला मुख्य रूप से ब्रेथ एनालाइजर टेस्ट पर आधारित था, जिसके बाद अधिकारी को गिरफ्तार कर विभागीय कार्यवाही के बाद सेवा से हटा दिया गया।
सिंगल बेंच के सामने याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि केवल ब्रेथ एनालाइजर टेस्ट के आधार पर शराब सेवन साबित नहीं किया जा सकता, क्योंकि न तो ब्लड टेस्ट हुआ और न ही यूरिन टेस्ट। साथ ही जरूरी दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए और न ही प्रस्तुतिकरण अधिकारी नियुक्त किया गया, जो प्रक्रिया का उल्लंघन है।
सिंगल बेंच ने प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन के आधार पर बर्खास्तगी रद्द की थी और यह माना था कि ब्रेथ एनालाइजर रिपोर्ट निर्णायक प्रमाण नहीं है।
हालांकि, राज्य की अपील पर सुनवाई करते हुए खंडपीठ ने कहा कि सिंगल बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को सही ढंग से नहीं समझा। अदालत ने कहा कि उस फैसले में यह मुद्दा तय ही नहीं किया गया कि ब्रेथ एनालाइजर टेस्ट अंतिम प्रमाण है या नहीं।
खंडपीठ ने कहा,
“सुप्रीम कोर्ट के उक्त निर्णय में यह प्रश्न तय नहीं किया गया कि ब्रेथ एनालाइजर टेस्ट शराब सेवन का निर्णायक प्रमाण है या नहीं, इसलिए यह कहना सही नहीं है कि उस निर्णय में ऐसा कोई सिद्धांत स्थापित किया गया।”
इसके बावजूद, हाईकोर्ट ने माना कि विभागीय कार्यवाही में गंभीर प्रक्रिया संबंधी खामियां थीं जैसे प्रस्तुतिकरण अधिकारी की नियुक्ति न करना और आवश्यक दस्तावेज न देना, जिससे पूरी कार्यवाही प्रभावित हुई।
अदालत ने यह भी कहा कि कानून के तहत ब्रेथ एनालाइजर रिपोर्ट को साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया जा सकता है लेकिन केवल उसी के आधार पर निष्कर्ष निकालना परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
चूंकि संबंधित अधिकारी रिटायर हो चुके थे और कार्यवाही में मूलभूत त्रुटियां थीं, इसलिए अदालत ने मामले को दोबारा जांच के लिए वापस भेजने से इनकार किया।
अंततः पटना हाईकोर्ट ने राज्य की अपील खारिज करते हुए सिंगल बेंच के आदेश में हस्तक्षेप से इनकार किया।

