जजों के वेतन का ब्योरा RTI Act से बाहर नहीं, नागरिकों को जानकारी देने से इनकार नहीं किया जा सकता: मद्रास हाईकोर्ट

Amir Ahmad

31 July 2026 12:27 PM IST

  • जजों के वेतन का ब्योरा RTI Act से बाहर नहीं, नागरिकों को जानकारी देने से इनकार नहीं किया जा सकता: मद्रास हाईकोर्ट

    मद्रास हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि जजों के वेतनमान और वेतन संबंधी जानकारी सूचना का अधिकार (RTI Act) अधिनियम की धारा 8 के तहत गोपनीय जानकारी नहीं है। चूंकि जजों का वेतन भारत की संचित निधि से दिया जाता है, इसलिए नागरिकों को इसकी जानकारी प्राप्त करने का अधिकार है।

    जस्टिस एम. धंडपानी ने कहा,

    "जजों का वेतन भारत की संचित निधि से दिया जाता है। यह सार्वजनिक धन है, इसलिए भारत का कोई भी नागरिक उनके वेतन संबंधी जानकारी जानने से वंचित नहीं किया जा सकता। यह RTI Act की धारा 8 के तहत अपवाद की श्रेणी में नहीं आता।"

    मामला मद्रास हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल की उस याचिका से जुड़ा था, जिसमें तमिलनाडु सूचना आयोग के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसके तहत RTI आवेदक को मांगी गई जानकारी उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया।

    RTI आवेदक अकबर अहमद ने वर्ष 2019 के पार्टी-इन-पर्सन नियमों से संबंधित जानकारी मांगी थी। उन्होंने पार्टी-इन-पर्सन समिति के सदस्यों के नाम, पद, विधि क्षेत्र में उनका पूर्व एवं वर्तमान अनुभव, उपलब्धियां, शैक्षणिक योग्यता, विशेषज्ञता, आचरण संबंधी विवरण, वेतनमान तथा हाईकोर्ट की प्रशासनिक समिति के कार्य, जिम्मेदारियां और अधिकारों की जानकारी मांगी थी।

    हाईकोर्ट के लोक सूचना अधिकारी ने यह जानकारी देने से इनकार किया था। प्रथम अपील भी खारिज होने के बाद आवेदक ने तमिलनाडु सूचना आयोग का रुख किया। आयोग ने हाईकोर्ट को जानकारी उपलब्ध कराने का निर्देश दिया, जिसके खिलाफ रजिस्ट्रार जनरल ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

    हाईकोर्ट रजिस्ट्री की ओर से दलील दी गई कि मांगी गई जानकारी आंतरिक प्रशासन से जुड़ी है और RTI Act की धारा 8 के तहत सार्वजनिक करने से छूट प्राप्त है। इसके समर्थन में पूर्व के एक फैसले का हवाला भी दिया गया।

    वहीं तमिलनाडु सूचना आयोग ने कहा कि मांगी गई जानकारी न तो किसी विश्वासगत संबंध में रखी गई सूचना है और न ही यह व्यक्तिगत प्रकृति की है। यदि संसद या राज्य विधानसभा ऐसी जानकारी मांग सकती है, तो नागरिक को भी इसे प्राप्त करने का अधिकार है।

    सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि आवेदक द्वारा मांगी गई अधिकांश जानकारी सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा है और प्रत्येक नागरिक के लिए उपलब्ध हो सकती है।

    अदालत ने कहा कि पार्टी-इन-पर्सन समिति का गठन एक प्रशासनिक निर्णय है, जिसे गोपनीय नहीं माना जा सकता। समिति के गठन, उसके सदस्यों की योग्यता और अनुभव जैसी जानकारी साझा करने से हाईकोर्ट के प्रशासनिक कामकाज पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।

    हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि समितियों के कार्य और उनकी संरचना से जुड़ी जानकारी में ऐसा कोई गोपनीय या संवेदनशील तत्व नहीं है, जिसे सार्वजनिक करने से रोका जाए।

    इन टिप्पणियों के साथ मद्रास हाईकोर्ट ने रजिस्ट्री की याचिका खारिज की और निर्देश दिया कि RTI आवेदक को मांगी गई जानकारी दो सप्ताह के भीतर उपलब्ध कराई जाए।

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