पेरारिवलन के वकील नामांकन मामले में मद्रास हाईकोर्ट की टिप्पणी, पूछा- CBI जांच का आधार क्या है?
Amir Ahmad
9 Jun 2026 5:10 PM IST

राजीव गांधी हत्या मामले के दोषी रहे ए. जी. पेरारिवलन के एडवोकेट के रूप में नामांकन को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए मद्रास हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) आवश्यक पक्षकार नहीं है। अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि आखिर ऐसा कौन-सा धोखाधड़ी का मामला है, जिसके लिए सीबीआई जांच का आदेश दिया जाए।
चीफ जस्टिस एस. ए. धर्माधिकारी और जस्टिस जी. अरुल मुरुगन की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता की ओर से CBI जांच संबंधी अंतरिम मांग पर जोर नहीं दिए जाने के बाद CBI के खिलाफ याचिका खारिज की।
सुनवाई के दौरान अदालत ने मौखिक रूप से कहा,
"CBI जांच का आदेश देने के लिए धोखाधड़ी कहां है? क्या आपको पता है कि किन मामलों में CBI जांच के आदेश दिए जा सकते हैं? सुप्रीम कोर्ट स्पष्ट कर चुका है कि ऐसे आदेश केवल दुर्लभ मामलों में ही दिए जा सकते हैं। नामांकन कानून के प्रावधानों के अनुसार हुआ है। याचिका में यह भी नहीं बताया गया कि CBI जांच की आवश्यकता क्यों है।"
इसके बाद अदालत ने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता अंतरिम राहत पर जोर नहीं दे रहा है, इसलिए CBI इस मामले में आवश्यक पक्षकार नहीं है। चूंकि मुख्य याचिका में भी CBI के खिलाफ कोई राहत नहीं मांगी गई, इसलिए उसके विरुद्ध याचिका समाप्त की जाती है।
यह याचिका कांग्रेस सांसद आर. सुधा ने दायर की। उन्होंने एडवोकेट एक्ट की धारा 24ए को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की है, जहां तक वह मृत्युदंड या आजीवन कारावास की सजा पाए व्यक्तियों को रिहाई के दो वर्ष बाद अधिवक्ता के रूप में नामांकन की अनुमति देती है। साथ ही उन्होंने पेरारिवलन के नामांकन को भी अवैध घोषित करने की मांग की।
याचिका में कहा गया कि पेरारिवलन की रिहाई का आधार केवल दया याचिका के निस्तारण में हुई असाधारण देरी थी और इससे उनके अपराध का दोष समाप्त नहीं हो जाता। याचिकाकर्ता का तर्क है कि आतंकवाद जैसे गंभीर अपराध में दोषसिद्ध व्यक्ति को वकील बनने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी पूछा कि याचिका में मांगी गई घोषणा संबंधी रिट संविधान में किस आधार पर उपलब्ध है। अदालत ने यह भी कहा कि अधिवक्ता अधिनियम की धारा 24ए को चुनौती दी गई लेकिन उसके समर्थन में पर्याप्त कानूनी आधार प्रस्तुत नहीं किए गए।
खंडपीठ ने यह भी उल्लेख किया कि अधिनियम के अनुसार नैतिक अधमता से जुड़े अपराध में दोषी ठहराए गए व्यक्ति को अधिवक्ता के रूप में नामांकित नहीं किया जा सकता। अदालत ने सवाल उठाया कि क्या भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 के तहत दोषसिद्धि को नैतिक अधमता वाला अपराध माना जा सकता है।
अदालत ने कहा,
"यह देखना होगा कि किस अपराध में दोषसिद्धि हुई और क्या वह नैतिक अधमता की श्रेणी में आता है।"
हालांकि, अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि अधिनियम में एक प्रावधान है, जिसके अनुसार रिहाई के दो वर्ष बाद नामांकन पर लगी रोक स्वतः समाप्त हो जाती है। चूंकि पेरारिवलन वर्ष 2022 में जेल से रिहा हुए थे, इसलिए प्रथम दृष्टया उनके नामांकन में कोई कानूनी बाधा दिखाई नहीं देती।
मामले में केंद्र सरकार के गृह विभाग, विधि कार्य विभाग, बार काउंसिल ऑफ इंडिया, तमिलनाडु एवं पुडुचेरी बार काउंसिल तथा ए. जी. पेरारिवलन को जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया गया।

