मद्रास हाईकोर्ट ने तीन मठों में मदाथिपति के रूप में नियुक्ति के लिए नित्यानंद की याचिका खारिज की
Amir Ahmad
31 Jan 2025 11:18 AM

हाईकोर्ट ने शुक्रवार को स्वामी नित्यानंद द्वारा दायर की गई अपील खारिज की, जिसमें उन्होंने तीन मठों - सोमनाथ स्वामी मंदिर और मठ, तिरुवरुर, अरुणाचल ज्ञानदेसिकर स्वामी मंदिर और मठ, वेदारण्यम और पो.का.सथुकल मदाम, वेदारण्यम के मदाथिपति या प्रमुख के रूप में नियुक्त किए जाने की मांग की थी।
उनकी अपील खारिज करते हुए जस्टिस आर सुब्रमण्यन और जस्टिस सी कुमारप्पन की खंडपीठ ने मौखिक रूप से टिप्पणी की कि नित्यानंद मंदिरों का प्रशासन करने के लिए भारत में भी नहीं हैं। इस प्रकार न्यायालय ने कहा कि एकल न्यायाधीश के निर्णय में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं है।
नित्यानंद ने हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती बोर्ड के आयुक्त के आदेश के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया, जिसमें सहायक आयुक्त को HR&CE Act की धारा 60 के अनुसार तीनों मंदिरों की संपत्तियों के प्रशासन के लिए कार्यकारी अधिकारियों की नियुक्ति करने का निर्देश दिया गया था।
नित्यानंद ने प्रस्तुत किया कि उन्हें मठों के प्रशासन और नियंत्रण के लिए श्री स्वामी अथमानंद, पूर्व में मदाथिपति द्वारा नामित किया गया था। नामांकन विलेख भी पंजीकरण के लिए उप-पंजीयक के समक्ष प्रस्तुत किया गया। हालांकि कुछ विवाद के कारण स्वामी अथमानंद ने नित्यानंद के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई। उन्होंने अदालत को यह भी बताया कि उन्होंने मठों के मदाथिपति के रूप में उन्हें घोषित करने और अथमानंद स्वामी को मंदिर के मामलों में हस्तक्षेप करने से रोकने के लिए सिविल मुकदमा दायर किया, जिसमें उनके पक्ष में अंतरिम निषेधाज्ञा दी गई।
नित्यानंद ने आगे प्रस्तुत किया कि जब यह अंतरिम निषेधाज्ञा मौजूद थी तब आयुक्त ने कुछ निजी व्यक्तियों की शिकायतों के आधार पर विवादित आदेश पारित किए। उन्होंने तर्क दिया कि मठ के मामलों में अधिकारियों की कोई भूमिका नहीं थी, क्योंकि उन्हें पहले के मदाथिपति द्वारा विधिवत नियुक्त किया गया। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि विवादित आदेश उन्हें सुनवाई का अवसर दिए बिना पारित किया गया। इस प्रकार यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि सिविल मुकदमे के लंबित रहने के दौरान पारित आदेश कानूनन गलत और अस्थिर था
।दूसरी ओर, विभाग ने दलील दी कि मठ की सभी संपत्तियां HR&CE Act के दायरे में आती हैं। इस प्रकार, नित्यानंद द्वारा उठाया गया तर्क कानूनी रूप से टिकने योग्य नहीं है। यह दलील दी गई कि मठ के पास कई संपत्तियां हैं, जिनमें से कुछ को मदाथिपति और उनके पावर एजेंटों ने अपने निजी लाभ के लिए अवैध रूप से अलग कर दिया था। विभाग ने अपने मामले का समर्थन करने के लिए दस्तावेज भी पेश किए।
विभाग ने आगे तर्क दिया कि नित्यानंद के पक्ष में निष्पादित नामांकन विलेख स्वयं सवालों के घेरे में है, क्योंकि इसे अमान्य होने के कारण रजिस्ट्रेशन प्राधिकरण के समक्ष पंजीकृत नहीं किया गया। इस प्रकार विभाग ने अदालत को सूचित किया कि उसने मठ की संपत्तियों की सुरक्षा के लिए उचित प्रक्रियाओं का पालन करने के बाद विवादित आदेश पारित किया था।
विभाग की दलीलों में दम पाते हुए एकल न्यायाधीश ने टिप्पणी की थी कि नित्यानंद के पक्ष में नामांकन अवैध है, क्योंकि इससे पहले मदाथिपति को दी गई शक्ति रद्द हो गई। अदालत ने यह भी कहा कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं हुआ, क्योंकि आदेश पारित करने से पहले विस्तृत जांच की गई। अदालत ने यह भी कहा कि नित्यानंद का ठिकाना अज्ञात है। इस प्रकार, उनके द्वारा अपने प्रतिनिधियों को दी गई शक्ति संदिग्ध है। इस प्रकार कोई योग्यता न पाते हुए एकल न्यायाधीश ने नित्यानंद की याचिका खारिज कर दी।
इस आदेश को चुनौती देते हुए नित्यानंद ने तर्क दिया कि एकल न्यायाधीश ने यह मान कर गलती की कि उनका ठिकाना अज्ञात है। नित्यानंद ने कहा कि उनका ठिकाना सार्वजनिक जानकारी का हिस्सा था और वे कैलासा में थे, जो इक्वाडोर के पास एक देश है, जिसके 50 से अधिक देशों के साथ राजनयिक संबंध हैं और जिसे संयुक्त राष्ट्र द्वारा भी मान्यता प्राप्त है। उन्होंने यह भी कहा कि उनके पक्ष में नामांकन पहले से ही नागपट्टिनम में उप न्यायालय के समक्ष मुकदमे का विषय था। इस प्रकार एकल न्यायाधीश ने इसे वैध न मानने में गलती की थी।
HR&CE ने कहा कि एकल न्यायाधीश के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं था। यह तर्क दिया गया कि नित्यानंद के खिलाफ़ आपराधिक मामले लंबित हैं और इसलिए उन्हें मठ प्रमुख के रूप में नियुक्त नहीं किया जा सकता, खासकर जब नामांकन ही संदिग्ध था।
खंडपीठ नित्यानंद की दलीलों को स्वीकार करने के लिए इच्छुक नहीं थी। अदालत ने यह भी आश्चर्य जताया कि नित्यानंद मंदिर की संपत्तियों का प्रशासन कैसे कर पाएंगे, जब वह देश में रहते ही नहीं हैं। इस प्रकार, उनकी अपील में कोई योग्यता न पाते हुए, अदालत ने उसे खारिज कर दिया।
केस टाइटल: नित्यानंद स्वामी बनाम आयुक्त और अन्य