मध्यप्रदेश हाईकोर्ट का फैसला: दंगे के मामले में सम्मानजनक बरी होने की जानकारी छिपाने पर पुलिस कांस्टेबल की बर्खास्तगी बरकरार

Amir Ahmad

17 July 2026 5:39 PM IST

  • मध्यप्रदेश हाईकोर्ट का फैसला: दंगे के मामले में सम्मानजनक बरी होने की जानकारी छिपाने पर पुलिस कांस्टेबल की बर्खास्तगी बरकरार

    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने दंगे और ईंट-पत्थर फेंकने के मामले में लाभ के संदेह (बेनिफिट ऑफ डाउट) के आधार पर बरी हुए पुलिस कांस्टेबल की सेवा से बर्खास्तगी को सही ठहराया। हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता ने यह तथ्य छिपाया कि उसकी बरी होना सम्मानजनक (क्लीन) नहीं था। ऐसे व्यक्ति की पुलिस जैसे अनुशासित बल में नियुक्ति पुलिस की अनुशासन व्यवस्था और प्रतिष्ठा पर सवाल खड़े करेगी।

    जस्टिस दीपक खोत की एकलपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता की आपराधिक मामले में संलिप्तता भले ही संदेहास्पद रही हो लेकिन उसके खिलाफ लगाए गए आरोप कानून-व्यवस्था के प्रति उसके रवैये को दर्शाते हैं।

    अदालत ने अपने आदेश में कहा,

    "यदि ऐसे चरित्र वाले व्यक्ति की नियुक्ति की जाती है तो यह अनुशासित पुलिस बल की अनुशासन व्यवस्था और प्रतिष्ठा पर निश्चित रूप से प्रश्नचिह्न लगाएगा।"

    मामला मध्य प्रदेश कर्मचारी चयन मंडल द्वारा चालक (कांस्टेबल) के पद पर भर्ती से जुड़ा है। याचिकाकर्ता लिखित परीक्षा और शारीरिक दक्षता परीक्षा पास करने के बाद नियुक्त भी हो गया।

    नियुक्ति से पहले उसने सत्यापन प्रपत्र में अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले का उल्लेख किया, लेकिन नियुक्ति के समय दिए गए शपथपत्र में इसकी जानकारी नहीं दी। उसका कहना था कि यह एक अनजाने में हुई त्रुटि थी। उसने यह भी दावा किया कि वह संबंधित आपराधिक मामले में सक्षम अदालत से बरी हो चुका है और उसे एक मामूली विवाद में बेवजह फंसाया गया।

    इसके बाद विभाग ने उसके चरित्र सत्यापन की प्रक्रिया शुरू की और उसका पक्ष मांगा। मामला स्क्रीनिंग समिति के सामने रखा गया। समिति ने माना कि याचिकाकर्ता ने आपराधिक मामले के अस्तित्व को नहीं छिपाया, लेकिन उसकी बरी होना सम्मानजनक नहीं था। इसी आधार पर उसे सेवा से हटा दिया गया।

    राज्य की ओर से कहा गया कि याचिकाकर्ता ने सत्यापन प्रपत्र में आपराधिक मामले का उल्लेख तो किया, लेकिन नियुक्ति के समय दिए गए शपथपत्र में इसे छिपा लिया। यह केवल भूल नहीं मानी जा सकती, क्योंकि शपथपत्र नियुक्ति प्रक्रिया का महत्वपूर्ण दस्तावेज था और उसमें पूरी एवं सही जानकारी देना उसकी जिम्मेदारी थी।

    रिकॉर्ड के अनुसार याचिकाकर्ता पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 147 (दंगा), 294 (अश्लील कृत्य), 323 (मारपीट), 341 (गलत तरीके से रोकना) और 506 (आपराधिक धमकी) समेत अन्य धाराओं में मामला दर्ज किया गया। आरोप था कि चुनाव के बाद हुई हिंसा के दौरान उसने ईंट-पत्थर फेंके थे।

    हाईकोर्ट ने पाया कि आपराधिक अदालत ने याचिकाकर्ता को इसलिए बरी किया, क्योंकि कोई भी गवाह उसकी पहचान नहीं कर सका। यानी उसे संदेह का लाभ मिला था, न कि सम्मानजनक रूप से दोषमुक्त घोषित किया गया।

    अदालत ने यह भी कहा कि चरित्र सत्यापन रिपोर्ट से स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता ने अपनी बरी होने की प्रकृति के बारे में गलत जानकारी दी। उसने सत्यापन प्रपत्र में उस प्रश्न के सामने 'नहीं' लिखा, जिसमें पूछा गया कि क्या बरी होना संदेह का लाभ मिलने या अन्य कारणों से हुआ है। जबकि उसे इस तथ्य की पूरी जानकारी थी।

    पीठ ने कहा,

    "एक बार गलती हो सकती है लेकिन शपथपत्र में भी वही तथ्य दोहराना यह दर्शाता है कि याचिकाकर्ता ने पूरी जानकारी होने के बावजूद तथ्य छिपाए।"

    अदालत ने कहा कि पुलिस बल एक अत्यंत अनुशासित सेवा है जहां कर्मियों से उच्च स्तर की ईमानदारी, निष्पक्षता और उत्कृष्ट चरित्र की अपेक्षा की जाती है। याचिकाकर्ता के खिलाफ दर्ज अपराध किसी भी दृष्टि से मामूली नहीं थे।

    हाईकोर्ट ने यह भी माना कि याचिकाकर्ता के खिलाफ दर्ज अपराध नैतिक अधमता की श्रेणी में आते हैं। ऐसे में नियुक्ति समाप्त करने का विभाग का निर्णय पूरी तरह उचित था।

    इन्हीं कारणों से हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कांस्टेबल की बर्खास्तगी बरकरार रखी।

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