आदेश में सभी दलीलों का उल्लेख न होने से जज को पक्षपाती नहीं कहा जा सकता : मध्यप्रदेश हाईकोर्ट
Amir Ahmad
20 May 2026 3:35 PM IST

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने न्यायिक पक्षपात की आशंका जताते हुए दायर स्थानांतरण आवेदन खारिज करते हुए कहा कि केवल इस आधार पर किसी जज को पक्षपाती नहीं कहा जा सकता कि अदालत के आदेश में किसी पक्ष की कुछ दलीलों का उल्लेख नहीं किया गया।
जस्टिस हिमांशु जोशी की पीठ ने कहा कि अदालत हर उस दलील को आदेश में दर्ज करने के लिए बाध्य नहीं होती, जिसका विवाद के मूल मुद्दों से सीधा संबंध न हो।
अदालत ने कहा,
“न्यायिक आदेशों में केवल महत्वपूर्ण तथ्यों, लागू कानून और उन तर्कों का उल्लेख आवश्यक होता है, जिनका विवाद के निपटारे पर सीधा प्रभाव पड़ता है। अप्रासंगिक, दोहराव वाले या अनावश्यक तर्कों को विस्तार से दर्ज करना जरूरी नहीं है।”
आवेदक ने यह कहते हुए मामले को दूसरी अदालत में स्थानांतरित करने की मांग की थी कि 16 अप्रैल 2026 के आदेश में उसकी ओर से रखी गई कुछ दलीलों का उल्लेख नहीं किया गया। उसके अनुसार इससे अदालत की निष्पक्षता पर वास्तविक आशंका पैदा हुई।
याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि पहले आदेश के तुरंत बाद वर्तमान याचिका को सूचीबद्ध किया जाना भी अदालत की निष्पक्षता पर संदेह उत्पन्न करता है। साथ ही आवेदक ने अनुरोध किया था कि उससे संबंधित कोई भी मामला उसी पीठ के समक्ष सूचीबद्ध न किया जाए।
हाईकोर्ट ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि न्याय व्यवस्था ईमानदारी, निष्पक्षता और न्यायपालिका की स्वतंत्रता जैसे मूल सिद्धांतों पर आधारित है। अदालत ने कहा कि केवल किसी पक्ष की व्यक्तिगत आशंका, चाहे वह कितनी भी प्रबल क्यों न हो स्थानांतरण का आधार नहीं बन सकती जब तक पक्षपात की वास्तविक संभावना दर्शाने वाला कोई ठोस वस्तुनिष्ठ आधार न हो।
अदालत ने यह भी कहा कि आवेदन में लगाए गए आरोप तथ्यों की बजाय बाहरी धारणाओं और सनसनीखेज आरोपों से प्रभावित प्रतीत होते हैं।
पीठ ने टिप्पणी की,
“यदि ऐसी प्रवृत्तियों को रोका नहीं गया तो इससे न्याय व्यवस्था में जनता का विश्वास कमजोर हो सकता है। इसलिए इन्हें सख्ती से हतोत्साहित किया जाना चाहिए।”
हाईकोर्ट ने कहा कि केवल इसलिए कि किसी पक्ष को मनचाहा परिणाम नहीं मिला, अदालत की निष्पक्षता पर बेबुनियाद आरोप लगाना न्यायिक व्यवस्था के हित में नहीं है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मामलों की सूचीबद्धता तय प्रक्रिया और प्रशासनिक नियमों के अनुसार होती है, जो न्यायिक निर्णय प्रक्रिया से स्वतंत्र है। इसलिए याचिकाकर्ता द्वारा लगाए गए आरोप पूरी तरह निराधार और अनुचित हैं।
पीठ ने कहा कि यदि किसी न्यायिक आदेश में अनजाने में कोई त्रुटि या चूक रह जाती है तो उसके लिए कानून में सुधार या स्पष्टीकरण के उचित उपाय उपलब्ध हैं।
इन्हीं टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने स्थानांतरण आवेदन निराधार बताते हुए खारिज किया।

