अपनी ACR मांगने का कर्मचारी को अधिकार, निजता का हवाला देकर जानकारी नहीं रोक सकता राज्य: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
Amir Ahmad
13 May 2026 12:21 PM IST

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि कोई भी सरकारी कर्मचारी सूचना का अधिकार कानून के तहत अपनी वार्षिक गोपनीय प्रतिवेदन (ACR) की प्रतियां मांग सकता है और राज्य सरकार निजता का हवाला देकर ऐसी जानकारी देने से इनकार नहीं कर सकती।
जस्टिस दीपक खोत की पीठ ने कहा कि जब किसी कर्मचारी के पास जानकारी प्राप्त करने का कोई अन्य प्रभावी उपाय नहीं बचता, तब वह RTI कानून के तहत आवेदन करने के लिए बाध्य होता है। ऐसे मामलों में केवल इस आधार पर आवेदन खारिज नहीं किया जा सकता कि सार्वजनिक हित और निजता के बीच संतुलन को लेकर अलग से संतोष दर्ज नहीं किया गया।
अदालत ने कहा,
“सार्वजनिक हित की व्याख्या करते समय निजता के अधिकार और सूचना के अधिकार के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है। दोनों अधिकार भारतीय संविधान की मूल संवैधानिक मूल्यों से उत्पन्न होते हैं।”
मामला उस याचिका से जुड़ा था, जिसमें राज्य सरकार ने मुख्य सूचना आयुक्त के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत एक सरकारी कर्मचारी को उसकी ACR उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया था।
राज्य सरकार का तर्क था कि मांगी गई जानकारी RTI कानून की धारा 8(1)(जे) के तहत निजी सूचना की श्रेणी में आती है, जिसका खुलासा करने से निजता का अनावश्यक उल्लंघन हो सकता है। सरकार ने कहा कि लोक सूचना अधिकारी और अपीलीय प्राधिकारी ने सही तरीके से आवेदन खारिज किया लेकिन राज्य सूचना आयुक्त ने गलत तरीके से जानकारी देने का आदेश दे दिया।
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की दलील खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट के 'देव दत्त' मामले के फैसले का हवाला दिया। उस फैसले में कहा गया कि निष्पक्षता और प्रशासनिक पारदर्शिता बनाए रखने के लिए कर्मचारियों की एसीआर में की गई सभी प्रविष्टियों की जानकारी उन्हें उचित समय के भीतर दी जानी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि यदि कोई सरकारी आदेश एसीआर की जानकारी देने से रोकता है तो वह संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होगा।
हाईकोर्ट ने कहा कि मौजूदा मामले में कर्मचारी ने केवल अपनी ही एसीआर की जानकारी मांगी थी, इसलिए इसे निजता का उल्लंघन नहीं माना जा सकता।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जब ACR सामान्य रूप से कर्मचारी को उपलब्ध नहीं कराई जाती, तब RTI कानून के तहत उसे मांगना ही एकमात्र उपाय रह जाता है।
इन्हीं टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने 1 दिसंबर 2009 के आदेश को सही ठहराते हुए राज्य सरकार की याचिका खारिज की।

