खाद्य नमूने की केंद्रीय प्रयोगशाला से जांच के अधिकार की जानकारी न देना अभियोजन को अवैध बनाता है: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

Amir Ahmad

20 Jun 2026 12:24 PM IST

  • खाद्य नमूने की केंद्रीय प्रयोगशाला से जांच के अधिकार की जानकारी न देना अभियोजन को अवैध बनाता है: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि किसी आरोपी को खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम, 1954 की धारा 13(2) के तहत उपलब्ध उसके वैधानिक अधिकार की जानकारी नहीं दी जाती, तो पूरा अभियोजन ही प्रभावित हो जाता है। अदालत ने कहा कि आरोपी को यह बताना अनिवार्य है कि वह खाद्य नमूने की जांच केंद्रीय खाद्य प्रयोगशाला से कराने का आवेदन कर सकता है।

    जस्टिस हिमांशु जोशी की पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए दो आरोपियों के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द की। अदालत ने पाया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई प्रमाण नहीं था, जिससे यह साबित हो सके कि आरोपियों को लोक विश्लेषक की रिपोर्ट और उनके अधिकार संबंधी अनिवार्य सूचना विधिवत भेजी गई।

    अदालत ने कहा,

    "धारा 13(2) के अनुपालन और आरोपी को उसके वैधानिक अधिकार की जानकारी दिए जाने को अभियोजन द्वारा सिद्ध करना आवश्यक था। इस मूलभूत शर्त के अभाव में ट्रायल कोर्ट का तर्क टिक नहीं सकता।"

    मामला वर्ष 2004 का है। वाराणसी-पुणे ज्ञान गंगा एक्सप्रेस के पैंट्री कार की जांच के दौरान खाद्य निरीक्षक को धनिया पाउडर संदिग्ध लगा। निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार नमूना लेकर जांच के लिए भेजा गया। लोक विश्लेषक की रिपोर्ट में नमूने को मिलावटी बताया गया, जिसके आधार पर संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम की धाराओं 7 और 16 के तहत शिकायत दर्ज की गई।

    याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि उनके खिलाफ केवल एक अन्य आरोपी द्वारा दी गई जानकारी के अलावा कोई स्वतंत्र साक्ष्य नहीं था। यह भी कहा गया कि जिस फर्म को पैंट्री सेवा का ठेका मिला था, उसके दैनिक संचालन या प्रबंधन में उनकी भूमिका साबित करने वाला कोई दस्तावेज रिकॉर्ड पर नहीं है।

    याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया कि अधिनियम की धारा 13(2) का पालन नहीं किया गया। इस प्रावधान के तहत स्थानीय स्वास्थ्य प्राधिकारी को लोक विश्लेषक की रिपोर्ट की प्रति आरोपी को भेजनी होती है और उसे यह जानकारी भी देनी होती है कि वह दस दिनों के भीतर अदालत में आवेदन देकर नमूने की जांच केंद्रीय खाद्य प्रयोगशाला से करा सकता है।

    हाईकोर्ट ने कहा कि यह अधिकार केवल औपचारिकता नहीं बल्कि आरोपी के बचाव का एक महत्वपूर्ण और ठोस कानूनी संरक्षण है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केंद्रीय खाद्य प्रयोगशाला द्वारा जारी प्रमाणपत्र लोक विश्लेषक की रिपोर्ट का स्थान ले लेता है और उसे अंतिम एवं निर्णायक साक्ष्य माना जाता है।

    पीठ ने कहा कि यदि आरोपी को इस अधिकार की जानकारी ही नहीं दी गई तो उसे अपने बचाव का महत्वपूर्ण अवसर नहीं मिल पाता, जिससे गंभीर पूर्वाग्रह उत्पन्न होता है।

    अदालत ने पाया कि आरोपियों को नोटिस और रिपोर्ट की विधिवत सेवा किए जाने का कोई प्रमाण नहीं था। इसके बावजूद निचली अदालत ने यह मानकर आरोप तय कर दिए कि आरोपियों ने केंद्रीय खाद्य प्रयोगशाला में जांच के लिए आवेदन नहीं किया।

    हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसा निष्कर्ष निकालने से पहले अभियोजन को यह साबित करना चाहिए कि धारा 13(2) का पूरा पालन किया गया था और आरोपियों को उनके अधिकार की स्पष्ट जानकारी दी गई।

    मामले की परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में आपराधिक मुकदमे को जारी रखना न्याय के साथ गंभीर अन्याय होगा। अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करते हुए हाइकोर्ट ने लंबित आपराधिक कार्यवाही रद्द की।

    इस फैसले में हाईकोर्ट ने दोहराया कि खाद्य अपमिश्रण मामलों में आरोपी को केंद्रीय खाद्य प्रयोगशाला से नमूने की जांच कराने का अधिकार एक महत्वपूर्ण वैधानिक सुरक्षा है और इसके पालन में चूक होने पर अभियोजन की वैधता पर ही प्रश्नचिह्न लग जाता है।

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