अपने खिलाफ विभागीय कार्रवाई संभालने वाले अधिकारी को उसी विभाग का प्रभार देना कानून के खिलाफ: एमपी हाईकोर्ट ने लगाई फटकार

Amir Ahmad

16 Jun 2026 1:41 PM IST

  • अपने खिलाफ विभागीय कार्रवाई संभालने वाले अधिकारी को उसी विभाग का प्रभार देना कानून के खिलाफ: एमपी हाईकोर्ट ने लगाई फटकार

    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि जिस अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई प्रस्तावित या लंबित हो, उसे उसी विभाग का प्रभार देना, जहां उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही की प्रक्रिया चल रही हो, कानून और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।

    अदालत ने राज्य सरकार के फैसले को रद्द करते हुए इसे सत्ता के दुरुपयोग का उदाहरण बताया।

    जस्टिस विवेक कुमार सिंह की एकलपीठ ने कहा कि संबंधित अधिकारी को अतिरिक्त प्रभार सौंपने का निर्णय अदालत की अंतरात्मा को झकझोरने वाला है।

    अदालत ने टिप्पणी की कि यह स्थिति ऐसी है। मानो किसी अधिकारी को अपने ही खिलाफ चल रही कार्रवाई की निगरानी और नियंत्रण का अधिकार दे दिया गया हो।

    मामला लोक निर्माण विभाग (PWD) के एक वरिष्ठ अधिकारी की याचिका से जुड़ा था। याचिकाकर्ता ने 29 अप्रैल 2026 के उस आदेश को चुनौती दी, जिसके तहत भोपाल ब्रिज जोन के मुख्य अभियंता का अतिरिक्त प्रभार उनसे वापस लेकर एक अन्य अधिकारी को सौंप दिया गया था।

    यह वही अधिकारी था, जिसके खिलाफ सिवनी में पुल ढहने के मामले में विभागीय कार्रवाई की तैयारी चल रही थी।

    अदालत के समक्ष प्रस्तुत दस्तावेजों से पता चला कि पुल हादसे के कारण सरकारी खजाने को लगभग 4.94 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था। इसके अलावा ग्वालियर में एक हजार बिस्तरों वाले अस्पताल परियोजना में भी लगभग 2.41 करोड़ रुपये की वित्तीय अनियमितताओं की जांच में उक्त अधिकारी की भूमिका सामने आई थी।

    सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि जनवरी 2025 में ही संबंधित अधिकारी के खिलाफ आरोपपत्र तैयार करने के निर्देश जारी किए जा चुके थे।

    राज्य सरकार ने भी अपने जवाब में स्वीकार किया कि सिवनी पुल मामले में विभागीय कार्यवाही अभी लंबित है।

    हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे अधिकारी को उसी कार्यालय का अतिरिक्त प्रभार देना, जहां उसके खिलाफ कार्रवाई की फाइलें और प्रक्रिया संचालित हो रही हों सीधे तौर पर प्राकृतिक न्याय के उस मूल सिद्धांत का उल्लंघन है, जिसके अनुसार कोई व्यक्ति अपने ही मामले में जज नहीं हो सकता।

    अदालत ने कहा,

    “राज्य सरकार ने एक ऐसे अधिकारी को अतिरिक्त प्रभार सौंप दिया जिसके खिलाफ गंभीर आरोपों की जांच चल रही है। यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि सरकारी परिपत्र में स्पष्ट रूप से लगाए गए प्रतिबंध की अवहेलना है।”

    हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ता को कारण बताओ नोटिस जारी करने के मात्र तीन घंटे के भीतर उनका अतिरिक्त प्रभार वापस ले लिया गया और दूसरे अधिकारी को सौंप दिया गया।

    अदालत ने इसे पूर्वनियोजित निर्णय बताते हुए कहा कि इससे प्राकृतिक न्याय के मूल सिद्धांतों की अनदेखी हुई।

    अदालत ने वर्ष 2004 के सरकारी परिपत्र का हवाला देते हुए कहा कि जिन अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच, सतर्कता संबंधी कार्रवाई, आपराधिक मुकदमा या गंभीर अनियमितताओं के आरोप लंबित हों, उन्हें उच्च पदों का अतिरिक्त या अस्थायी प्रभार नहीं दिया जा सकता।

    हाईकोर्ट ने लोक निर्माण विभाग के प्रमुख सचिव के रवैये पर भी नाराजगी जताई। अदालत ने कहा कि उनसे व्यक्तिगत शपथपत्र के माध्यम से इस निर्णय का आधार बताने को कहा गया, लेकिन उन्होंने सामान्य जवाब दाखिल किया, जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि वह संबंधित अधिकारी का बचाव करने का प्रयास कर रहे थे।

    अंततः हाईकोर्ट ने 29 अप्रैल 2026 का आदेश रद्द कर दिया और राज्य सरकार को निर्देश दिया कि मुख्य अभियंता का अतिरिक्त प्रभार किसी ऐसे पात्र अधिकारी को सौंपा जाए, जिसका सेवा रिकॉर्ड निष्कलंक हो और जिस पर किसी प्रकार का आरोप लंबित न हो।

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