वैधानिक गिरफ्तारी की स्थिति में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार्य नहीं, जमानत ही उचित उपाय: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
Amir Ahmad
11 Jun 2026 2:42 PM IST

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि जब कोई व्यक्ति संज्ञेय अपराधों से संबंधित कई FIR के आधार पर वैधानिक रूप से गिरफ्तार होकर न्यायिक हिरासत में है, तब उसके पक्ष में बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) की रिट जारी नहीं की जा सकती। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसी स्थिति में उचित कानूनी उपाय सक्षम अदालत से जमानत प्राप्त करना है।
जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस रत्नेश चंद्र सिंह बिसेन की खंडपीठ ने यह टिप्पणी एक याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जिसमें याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार ने उसे अनिश्चितकाल तक जेल में रखने के उद्देश्य से बार-बार राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत निरुद्ध किया और उसके खिलाफ नए आपराधिक मामले दर्ज किए।
याचिकाकर्ता का कहना था कि अगस्त, 2021 में हत्या के प्रयास के एक मामले में गिरफ्तारी के बाद उसके खिलाफ तीन बार राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत निरोध आदेश जारी किए गए। हालांकि, बाद में राज्य सलाहकार बोर्ड द्वारा मंजूरी न मिलने के कारण ये सभी आदेश निरस्त कर दिए गए। इसके बावजूद, उसे रिहा होने से रोकने के लिए लगातार नए मुकदमे दर्ज किए गए।
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी दलील दी गई कि उसकी गिरफ्तारी के बाद कई ऐसी FIR दर्ज की गईं, जो कथित रूप से उसकी गिरफ्तारी से पहले की घटनाओं से संबंधित थीं। इससे यह स्पष्ट होता है कि उसे लगातार हिरासत में रखने की कोशिश की गई।
राज्य सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता की वर्तमान हिरासत न्यायालयों द्वारा पारित आदेशों और विधिसम्मत आपराधिक मामलों पर आधारित है। इसलिए इसे अवैध हिरासत नहीं माना जा सकता और बंदी प्रत्यक्षीकरण की रिट का सहारा नहीं लिया जा सकता।
खंडपीठ ने पाया कि याचिका में चुनौती दिए गए तीनों NSA निरोध आदेश पहले ही समाप्त हो चुके हैं और वर्तमान में कोई भी निरोध आदेश प्रभावी नहीं है। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता की मौजूदा हिरासत विभिन्न आपराधिक मामलों में दर्ज FIR के आधार पर है, न कि किसी प्रचलित निरोध आदेश के कारण।
अदालत ने कहा,
"याचिकाकर्ता विभिन्न प्राथमिकियों में वैधानिक गिरफ्तारी के तहत हिरासत में है। ऐसी स्थिति में बंदी प्रत्यक्षीकरण की रिट जारी नहीं की जा सकती, विशेष रूप से तब जब हिरासत को अवैध नहीं माना जा सकता और उसके पास सक्षम अदालत से जमानत मांगने का वैधानिक उपाय उपलब्ध है।"
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि केवल इस आधार पर कि किसी व्यक्ति के खिलाफ कई FIR दर्ज हुईं, या उसने दुर्भावना का आरोप लगाया, उसकी हिरासत को अवैध नहीं माना जा सकता।
हालांकि अदालत ने याचिकाकर्ता को आंशिक राहत देते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया कि उसके तथा उसके परिवार के सदस्यों के खिलाफ दर्ज सभी लंबित आपराधिक मामलों की जानकारी उपलब्ध कराई जाए। साथ ही भविष्य में यदि कोई नया मामला दर्ज किया जाता है तो उसकी सूचना 24 घंटे के भीतर दी जाए।
अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि FIR दर्ज करने के आधार और जांच के दौरान एकत्र सामग्री की जानकारी भी याचिकाकर्ता को उपलब्ध कराई जाए।
इन निर्देशों के साथ हाईकोर्ट ने याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए अन्य सभी राहतें देने से इनकार किया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसके आदेश में की गई टिप्पणियां याचिकाकर्ता के जमानत आवेदन पर किसी प्रकार का प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालेंगी।

