498ए मामले में बरी होने से भरण-पोषण नहीं रोका जा सकता: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का अहम फैसला
Amir Ahmad
22 April 2026 6:03 PM IST

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पति का धारा 498ए के आपराधिक मामले में बरी होना, पत्नी और नाबालिग बच्चे को भरण-पोषण देने से बचने का आधार नहीं बन सकता, यदि वे स्वयं अपना पालन-पोषण करने में असमर्थ हैं।
जस्टिस गजेंद्र सिंह की पीठ ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 एक सामाजिक न्याय का प्रावधान है, जिसका उद्देश्य जरूरतमंद आश्रितों को आर्थिक सहारा देना है, न कि किसी को दंडित करना।
अदालत ने कहा,
“धारा 498ए में बरी होना अपने आप में भरण-पोषण से इनकार का आधार नहीं हो सकता, यदि यह साबित हो कि पत्नी और बच्चे स्वयं का भरण-पोषण नहीं कर सकते और पति के पास पर्याप्त साधन होते हुए भी वह उनकी उपेक्षा करता है।”
मामला फैमिली कोर्ट के उस आदेश से जुड़ा था, जिसमें पत्नी को 7,000 रुपये और नाबालिग बच्चे को 3,000 रुपये मासिक भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया। इस आदेश को पति और पत्नी दोनों ने चुनौती दी थी।
पति ने तर्क दिया कि चूंकि वह भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498ए के तहत दर्ज मामले में बरी हो चुका है, इसलिए पत्नी को भरण-पोषण का अधिकार नहीं है। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया।
अदालत ने स्पष्ट किया कि भरण-पोषण के लिए केवल यह साबित करना आवश्यक है कि पत्नी और बच्चा स्वयं का पालन-पोषण नहीं कर सकते और पति के पास पर्याप्त आय होते हुए भी वह उनकी देखभाल नहीं कर रहा है। इसके लिए कड़े सबूत की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि यह एक संक्षिप्त प्रक्रिया है।
हाईकोर्ट ने यह भी बताया कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के उपबंध (4) में ही वे स्थितियां बताई गईं, जब पत्नी भरण-पोषण की हकदार नहीं होती—जैसे व्यभिचार, बिना कारण पति से अलग रहना या आपसी सहमति से अलग रहना। इसमें यह कहीं नहीं कहा गया कि आपराधिक मामले में पति के बरी होने पर भरण-पोषण रोका जा सकता है।
अदालत ने यह भी कहा कि किसी आपराधिक मामले में बरी होना कई कारणों से हो सकता है, जैसे सबूतों की कमी या समझौता, इससे यह साबित नहीं होता कि पति ने अपने दायित्व पूरे किए।
मामले में अदालत ने पाया कि पत्नी और नाबालिग बच्चा स्वयं का पालन-पोषण करने में असमर्थ हैं और पति, जिसके पास स्थिर आय है ने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई। इसलिए अदालत ने भरण-पोषण का आदेश बरकरार रखते हुए बच्चे के लिए राशि बढ़ाई।

