FIR दर्ज कराने के चरण में मृतक का मीडिया को दिया बयान मृत्यु पूर्व बयान नहीं माना जा सकता: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
Amir Ahmad
15 Sept 2026 4:52 PM IST

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि FIR दर्ज कराने की मांग के चरण में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सामने मृतक द्वारा कथित रूप से दिए गए बयान को निर्णायक रूप से मृत्यु पूर्व बयान नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे बयान की प्रामाणिकता, सामग्री और साक्ष्य के रूप में उसकी अहमियत का निर्धारण सबूतों के आधार पर किया जाना जरूरी है।
जस्टिस हिमांशु जोशी की पीठ ने मृतक की पत्नी की उस अर्जी को खारिज किया, जिसमें पुलिस अधिकारियों पर उसके पति के साथ मारपीट करने और इसके कारण उसकी मौत होने का आरोप लगाते हुए FIR दर्ज करने का निर्देश देने की मांग की गई।
मामले के अनुसार पत्नी का आरोप है कि 16 अप्रैल, 2020 को कोरोना महामारी के दौरान लागू लॉकडाउन के बीच उसका पति गाय को चारा खिलाने के बाद खेत से लौट रहा था। इसी दौरान गोरा बाजार थाने में तैनात एक पुलिस अधिकारी ने कथित तौर पर उसके साथ मारपीट की। आरोप था कि इस घटना में पति को गंभीर चोटें आईं और 20 अप्रैल 2020 को उसकी मौत हो गई।
पत्नी ने दावा किया कि मौत से पहले उसके पति ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से बात की और मारपीट के लिए जिम्मेदार पुलिस अधिकारी का नाम बताया। उसने यह भी बताया कि जिला प्रशासन ने परिवार को 50 हजार रुपये की अनुग्रह राशि दी थी।
पत्नी के अनुसार उसने पुलिस अधीक्षक के समक्ष शिकायतें भी दी थीं और उनके साथ तस्वीरें, समाचार पत्रों की कतरनें तथा मर्ग की जानकारी संलग्न की है। इसके बावजूद FIR दर्ज नहीं की गई।
इसके बाद उसने न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी के समक्ष आवेदन दिया। मजिस्ट्रेट ने पुलिस से रिपोर्ट मंगाई और पाया कि मर्ग कार्यवाही के दौरान पहले ही जांच की जा चुकी है। इसलिए FIR दर्ज करने का निर्देश देने से इनकार किया। हालांकि मजिस्ट्रेट ने पत्नी की शिकायत को दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 200 के तहत निजी शिकायत के रूप में मानते हुए उसे कानून के अनुसार आगे बढ़ने को कहा।
इसके खिलाफ दायर पुनर्विचार याचिका को द्वितीय एडिशनल सेशन जज ने भी खारिज किया। इसके बाद पत्नी ने हाईकोर्ट का रुख किया।
पत्नी के वकील ने दलील दी कि निचली अदालतों ने मृतक के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सामने दिए गए बयान को उचित महत्व नहीं दिया। तस्वीरों, मेडिकल दस्तावेजों और जिला प्रशासन की ओर से दी गई अनुग्रह राशि को भी पुलिस अधिकारी द्वारा कथित मारपीट के समर्थन में बताया गया। इसी आधार पर CrPC की धारा 156(3) के तहत FIR दर्ज कर पुलिस जांच का निर्देश देने की मांग की गई।
वहीं राज्य की ओर से आवेदन का विरोध करते हुए कहा गया कि निचली अदालतों के आदेश में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है। मर्ग जांच पहले ही की जा चुकी है, संबंधित लोगों के बयान दर्ज किए गए और CCTV फुटेज सहित अन्य सामग्री की जांच की गई। राज्य ने यह भी कहा कि मेडिकल सामग्री से यह साबित नहीं होता कि मौत कथित मारपीट के कारण हुई। पुलिस और मजिस्ट्रेट की जांच में भी पुलिस अधिकारी द्वारा मारपीट के आरोप की पुष्टि नहीं हुई।
हाईकोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट ने पुलिस रिपोर्ट और मर्ग कार्यवाही के दौरान जुटाए गए साक्ष्यों पर विचार करने के बाद FIR दर्ज करने का निर्देश नहीं दिया, बल्कि आवेदन को धारा 200 के तहत शिकायत के रूप में आगे बढ़ाने की अनुमति दी। अदालत ने कहा कि कानून में ऐसी प्रक्रिया अपनाने की अनुमति है।
पीठ ने कहा कि पत्नी को कोई प्रभावी कानूनी उपाय उपलब्ध नहीं होने की स्थिति नहीं है। वह मजिस्ट्रेट के समक्ष साक्ष्य पेश कर सकती है और मजिस्ट्रेट धारा 200 तथा 202 के तहत आगे की कार्यवाही कर सकता है। परिस्थितियों के अनुसार कानून में उपलब्ध अन्य प्रक्रिया भी अपनाई जा सकती है।
अदालत ने यह भी कहा कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सामने मृतक द्वारा कथित रूप से दिया गया बयान इस स्तर पर निर्णायक रूप से मृत्यु पूर्व बयान नहीं माना जा सकता। उसकी वास्तविकता उसमें कही गई बातों और साक्ष्य के रूप में उसकी अहमियत को सबूतों के आधार पर साबित करना होगा। इसी तरह जिला प्रशासन की ओर से दी गई 50 हजार रुपये की अनुग्रह राशि से अपने आप यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि मौत हत्या के कारण हुई या उसमें पुलिसकर्मियों की भूमिका थी।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कथित हेरफेर के आरोप पर भी हाईकोर्ट ने हस्तक्षेप करने से इनकार किया। अदालत ने कहा कि अंतर्निहित अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए इस स्तर पर विभिन्न सामग्रियों का तुलनात्मक मूल्यांकन नहीं किया जा सकता।
पीठ ने अंततः कहा कि पत्नी के पास मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रभावी कानूनी उपाय उपलब्ध है और निचली अदालतों के आदेशों में अधिकार क्षेत्र संबंधी कोई त्रुटि, स्पष्ट विकृति या गंभीर कानूनी खामी नहीं मिली। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने अर्जी खारिज की।


