Autonomous Medical PG Admission Rules | इन-सर्विस डॉक्टरों को ग्रामीण सेवा के लिए बॉन्ड देने की आवश्यकता नहीं : मध्य प्रदेश हाइकोर्ट
Amir Ahmad
13 Jan 2026 11:36 AM IST

मध्य प्रदेश हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार की सेवा में कार्यरत (इन-सर्विस) डॉक्टरों को मेडिकल पोस्ट ग्रेजुएट कोर्स पूरा करने के बाद ग्रामीण सेवा के लिए बॉन्ड भरने की आवश्यकता नहीं है। अदालत ने कहा कि मध्य प्रदेश स्वायत्त मेडिकल एवं दंत स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम (डिग्री/डिप्लोमा) प्रवेश नियम, 2017 का नियम 11 इन-सर्विस डॉक्टरों पर लागू नहीं होता।
जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की खंडपीठ ने यह टिप्पणी डॉ. दीपाली बैरवा द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए की। याचिकाकर्ता ने भोपाल के मेडिकल एजुकेशन निदेशक के समक्ष ग्रामीण सेवा से जुड़े बॉन्ड से मुक्त किए जाने और उनके मूल प्रमाण पत्र लौटाने की मांग की थी।
डॉ. दीपाली बैरवा ने मार्च 2017 में एनेस्थीसिया में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा पूरा किया था। इसके बाद उन्हें मध्य प्रदेश मेडिकल साइंस यूनिवर्सिटी, जबलपुर द्वारा प्रमाण पत्र जारी किया गया और जुलाई 2017 में उन्होंने मेडिकल काउंसिल में रजिस्ट्रेशन कराया। याचिकाकर्ता का तर्क था कि पीजी डिप्लोमा का परिणाम घोषित होने के तीन महीने के भीतर उन्हें ग्रामीण पदस्थापना का कोई आदेश जारी नहीं किया गया, इसलिए नियमों के अनुसार उन्हें बॉन्ड की शर्तों से मुक्त किया जाना चाहिए।
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी दलील दी गई कि प्री-पीजी नियम, 2014 के तहत यदि तीन महीने की अवधि में ग्रामीण सेवा का नियुक्ति आदेश जारी नहीं होता है तो बॉन्ड स्वतः निरस्त माना जाता है। चूंकि स्वास्थ्य सेवा आयुक्त द्वारा निर्धारित अवधि में कोई आदेश पारित नहीं किया गया, इसलिए बॉन्ड की बाध्यता समाप्त होनी चाहिए।
वहीं राज्य सरकार की ओर से प्रस्तुत किया गया कि याचिकाकर्ता के मूल प्रमाण पत्र पहले ही अगस्त 2017 में एक अंतरिम आदेश के अनुपालन में लौटा दिए गए। इसके साथ ही यह भी कहा गया कि याचिकाकर्ता को जो अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) दिया गया, उसमें स्पष्ट शर्त थी कि सुपर स्पेशियलिटी/पीजी पाठ्यक्रम पूरा करने के बाद उन्हें एक वर्ष की अनिवार्य ग्रामीण सेवा करनी होगी।
राज्य सरकार ने यह भी बताया कि याचिकाकर्ता को दिसंबर 2016 में रतलाम में मेडिकल ऑफिसर के रूप में नियुक्त किया गया और पीजी डिप्लोमा के दौरान वह पहले से ही सरकारी सेवा में थीं। यह भी आरोप लगाया गया कि आगे की पढ़ाई के लिए अनुमति मिलने से पहले ही याचिकाकर्ता बिना स्वीकृति के अवकाश पर चली गईं, जिसे बाद में 'डायस नॉन' माना गया।
अदालत ने इस तथ्य पर भी गौर किया कि एमजी मेडिकल कॉलेज, इंदौर द्वारा जारी एनओसी में मूल प्रमाण पत्र लौटाते समय यह शर्त रखी गई कि याचिकाकर्ता एक वर्ष की ग्रामीण सेवा पूरी करेंगी। साथ ही कोर्ट ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में यह महत्वपूर्ण तथ्य छिपाया कि वह पहले से ही रतलाम में मेडिकल ऑफिसर के रूप में नियुक्त थीं।
नियम 11 की व्याख्या करते हुए हाइकोर्ट ने कहा कि यह प्रावधान चयनित अभ्यर्थियों पर लागू होता है, लेकिन उन पर नहीं जो पहले से सरकारी सेवा में हैं। चूंकि याचिकाकर्ता स्वास्थ्य सेवा विभाग में मेडिकल ऑफिसर के रूप में नियुक्त थीं और सेवा में रहते हुए उन्होंने पीजी डिप्लोमा में एडमिशन लिया था, इसलिए उन्हें ग्रामीण सेवा के लिए अलग से बॉन्ड देने की आवश्यकता नहीं थी। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में पाठ्यक्रम पूरा होने के बाद डॉक्टर को पुनः अपनी मूल सेवा में लौटना होता है।
हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता ने महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाकर कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जिससे वह “क्लीन हैंड्स” के सिद्धांत पर खरी नहीं उतरतीं। इस आधार पर भी याचिका को खारिज किए जाने योग्य माना गया।
खंडपीठ ने आदेश में कहा कि यदि याचिकाकर्ता स्वास्थ्य विभाग में मेडिकल ऑफिसर के रूप में पुनः अपनी सेवाएं ज्वाइन करना चाहती हैं तो उन्हें बॉन्ड की शर्तों के अनुसार ग्रामीण अथवा दूरस्थ क्षेत्रों में कार्य करना होगा। इन टिप्पणियों के साथ हाइकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।

