निजता में दखल: एमपी हाइकोर्ट ने पत्नी के वर्जिनिटी टेस्ट की मांग खारिज की

Amir Ahmad

28 Jan 2026 4:39 PM IST

  • निजता में दखल: एमपी हाइकोर्ट ने पत्नी के वर्जिनिटी टेस्ट की मांग खारिज की

    मध्य प्रदेश हाइकोर्ट ने हाल ही में एक पति की याचिका खारिज की, जिसमें उसने पत्नी द्वारा शारीरिक संबंध से इनकार किए जाने के आधार पर उसका वर्जिनिटी टेस्ट अथवा तथाकथित टू-फिंगर टेस्ट कराए जाने की मांग की थी। हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसा परीक्षण व्यक्ति की निजता का गंभीर उल्लंघन है और वैवाहिक विवाद के निपटारे के लिए न तो प्रासंगिक है और न ही निर्णायक।

    जस्टिस विवेक जैन की एकलपीठ ने कहा कि पत्नी को मेडिकल टेस्ट के लिए बाध्य करना केवल उसकी निजता में दखल होगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पति के पास यह साबित करने के लिए अन्य साक्ष्य प्रस्तुत करने का विकल्प खुला है कि पत्नी शारीरिक संबंध स्थापित करने में रुचि नहीं रखती, जैसा कि तलाक याचिका में आरोप लगाया गया।

    हाइकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि केवल शारीरिक संबंध से इनकार करना अपने आप में तलाक का आधार नहीं है और न ही यह हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 11 या 12 के तहत विवाह को शून्य या शून्यकरणीय ठहराने का कारण बनता है, और न ही यह धारा 13 के अंतर्गत तलाक का स्वतंत्र आधार है। ऐसे में वर्जिनिटी टेस्ट या टू-फिंगर टेस्ट न तो प्रासंगिक है और न ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचने में सहायक।

    यह मामला उस समय हाइकोर्ट के समक्ष आया जब पति ने फैमिली कोर्ट द्वारा उसकी तलाक याचिका खारिज किए जाने के आदेश को चुनौती दी। पति का आरोप था कि पत्नी द्वारा शारीरिक संबंध से इनकार करना मानसिक क्रूरता के दायरे में आता है। वहीं पत्नी ने सभी आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि उसे दहेज की मांग को लेकर प्रताड़ित किया गया, शारीरिक व मानसिक हिंसा का शिकार बनाया गया और पति द्वारा अप्राकृतिक यौन कृत्य भी किए गए।

    फैमिली कोर्ट में दायर एक आवेदन में पति ने पत्नी के चिकित्सकीय परीक्षण की मांग करते हुए यह जानने का आग्रह किया कि क्या उसने कभी किसी के साथ यौन संबंध बनाए हैं और क्या वह कभी अप्राकृतिक यौन कृत्य की शिकार रही है। फैमिली कोर्ट ने इस आवेदन को खारिज कर दिया, जिसे हाइकोर्ट ने सही ठहराया।

    पति की ओर से यह तर्क दिया गया कि वैवाहिक विवादों में निजता का अधिकार लागू नहीं होता, लेकिन हाइकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि निजता का अधिकार ऐसे मामलों में भी बना रहता है और इसे इस तरह के परीक्षण के माध्यम से समाप्त नहीं किया जा सकता।

    अदालत ने अप्राकृतिक यौन कृत्य से जुड़े आरोपों पर भी टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि ऐसा कृत्य कथित रूप से बहुत पहले हुआ हो तो मेडिकल जांच से कोई ठोस या निर्णायक परिणाम सामने नहीं आ सकता और यह केवल निजता का अतिक्रमण होगा।

    हाइकोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि मेडिकल साइंस के अनुसार कई मामलों में यौन संबंध के बाद भी हाइमन सुरक्षित रह सकता है, जबकि कुछ मामलों में बिना किसी यौन संबंध के भी हाइमन क्षतिग्रस्त हो सकता है। इसलिए हाइमन की स्थिति के आधार पर किसी महिला के यौन इतिहास के बारे में निष्कर्ष निकालना न तो वैज्ञानिक है और न ही न्यायसंगत।

    इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए हाइकोर्ट ने पति की याचिका खारिज की।

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