पत्नी के अडल्ट्री के आरोप सिद्ध करने के लिए DNA जांच का आदेश सही: मध्य प्रदेश हाइकोर्ट
Amir Ahmad
22 Jan 2026 1:35 PM IST

मध्य प्रदेश हाइकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश सही ठहराया, जिसमें पति की अर्जी पर नाबालिग बच्ची का DNA टेस्ट कराने की अनुमति दी गई थी। पति ने यह DNA जांच पत्नी पर लगाए गए व्यभिचार (अडल्ट्री) के आरोपों को साबित करने के लिए मांगी थी।
जस्टिस विवेक जैन की एकल पीठ ने पत्नी द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए कहा कि इस मामले में फैमिली कोर्ट द्वारा DNA जांच का आदेश देना पूरी तरह उचित है।
कोर्ट ने मामले के तथ्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि पति भारतीय सेना में कार्यरत है जबकि पत्नी मध्य प्रदेश पुलिस में कांस्टेबल है। पति ने यह दलील दी कि अक्टूबर, 2015 में पत्नी ने उसे बुलाया था और चार दिन के भीतर ही पत्नी ने यह जानकारी दी कि वह गर्भवती है। कोर्ट ने कहा कि मेडिकल रूप से चार दिन के भीतर गर्भ ठहरने की जानकारी संभव नहीं है।
पति ने यह भी दावा किया कि बच्ची का जन्म अक्टूबर, 2015 के लगभग आठ महीने के भीतर हो गया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि जिस समय गर्भधारण हुआ, उस समय पति का पत्नी से कोई संपर्क (नॉन-एक्सेस) नहीं था। इन तथ्यों के आधार पर पति ने पत्नी के व्यभिचार का आरोप लगाया।
हाइकोर्ट ने कहा,
“रिकॉर्ड पर स्पष्ट रूप से नॉन-एक्सेस की दलील मौजूद है। ऐसे में यह मामला DNA टेस्ट के लिए उपयुक्त है और फैमिली कोर्ट ने बच्ची का DNA टेस्ट कराने का आदेश देकर कोई त्रुटि नहीं की है।”
पत्नी की ओर से दलील दी गई थी कि DNA जांच से उसके निजता के अधिकार का उल्लंघन होगा और यह बच्ची की पहचान, स्वायत्तता और बाल अधिकारों से जुड़े अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन के भी खिलाफ है।
हालांकि, हाइकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि पति ने DNA जांच का अनुरोध बच्ची की वैधता को चुनौती देने या भरण-पोषण से बचने के लिए नहीं किया, बल्कि केवल व्यभिचार के आधार पर तलाक की याचिका को साबित करने के लिए किया।
हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जहां पर्याप्त दलीलें मौजूद हों, गर्भधारण के समय पति-पत्नी के बीच संपर्क न होने के ठोस आधार हों और बच्ची को अवैध घोषित करने की कोई मांग न की गई हो, वहां उपयुक्त मामलों में DNA टेस्ट का आदेश दिया जा सकता है।
इन कारणों से मध्य प्रदेश हाइकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश बरकरार रखते हुए पत्नी की याचिका खारिज कर दी।

