हत्या की सजा रद्द करते हुए मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने जज की कार्यक्षमता पर उठाए सवाल, मामला एक्टिंग चीफ जस्टिस के समक्ष भेजा
Amir Ahmad
5 Sept 2026 12:57 PM IST

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने हत्या के मामले में दोषसिद्धि रद्द करते हुए विशेष जज के फैसले में गंभीर त्रुटियां पाईं। अदालत ने साक्ष्यों के मूल्यांकन के तरीके पर चिंता जताते हुए विशेष जज, अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम (SC/ST Act) दमोह की संवेदनशील मामलों की सुनवाई के लिए उपयुक्तता पर गंभीर सवाल उठाए। हाईकोर्ट ने मामले को उचित निर्णय के लिए कार्यवाहक चीफ जस्टिस के समक्ष रखने का निर्देश दिया।
जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनिंद्र कुमार सिंह की खंडपीठ ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने FSL रिपोर्ट से जुड़े तथ्यों को गलत तरीके से दर्ज किया और दोषसिद्धि का आदेश ऐसे आधारों पर पारित किया, जो स्पष्ट और अस्तित्व में ही नहीं थे।
पीठ ने कहा,
“ट्रायल कोर्ट अपने दायित्वों का उचित सावधानी और तत्परता से निर्वहन करने में विफल रही है। साक्ष्य और अभिलेख पर उपलब्ध सामग्री के मूल्यांकन का तरीका गंभीर चिंता पैदा करता है और विशेष जज की इस तरह के संवेदनशील मामलों से निपटने की उपयुक्तता पर प्रथम दृष्टया सवाल खड़े करता है।”
अदालत ने निर्देश दिया कि मामले को कार्यवाहक चीफ जस्टिस के समक्ष रखा जाए ताकि इस संबंध में उचित निर्णय लिया जा सके।
मामला हत्या के दोषी ठहराए गए व्यक्ति की अपील से जुड़ा था। अपीलकर्ता की ओर से दलील दी गई कि अभियोजन का पूरा मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित था और हत्या का कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं था। यह भी कहा गया कि विशेष जज ने जिन तीन परिस्थितियों को दोषसिद्धि का आधार बनाया वे एक-दूसरे से जुड़ी नहीं थीं और उनसे अपराध साबित नहीं होता।
हाईकोर्ट ने अभियोजन के गवाह छोटेलाल अहिरवार जो मृतक लोटन लोधी का रिश्तेदार है, उनके बयान की जांच की। उसने बताया कि 22 मार्च 2024 को मृतक अपने घर के चबूतरे पर अपीलकर्ता के साथ बैठा था। मृतक ने उसे शराब खरीदने के लिए पैसे दिए। शराब लेकर लौटने के बाद मृतक और अपीलकर्ता हल्ले के घर की ओर चले गए। अगले दिन मृतक लाखन सिंह के दरवाजे पर मृत पाया गया।
पीठ ने गवाह के बयान में कई विसंगतियां पाईं। उसका बयान मृतक के कथित मृत्यु-पूर्व कथन से मेल नहीं खाता था। इसके अलावा घटना 22-23 मार्च 2024 की होने के बावजूद गवाह का बयान 4 मई 2024 को दर्ज किया गया, यानी काफी देरी से।
दोषसिद्धि के लिए दूसरी परिस्थिति के तौर पर अपीलकर्ता के घर से तीन नोट और एक मोबाइल बरामद किए जाने पर भरोसा किया गया। हाईकोर्ट ने पाया कि बरामद मोबाइल के संबंध में न तो सिम कार्ड के न होने का उल्लेख था और न ही उसका IMEI नंबर दर्ज किया गया।
अदालत ने यह भी पाया कि दस्तावेज पी-24 न तो स्पष्ट था और न ही पढ़ने योग्य। कॉल विवरण में अपीलकर्ता और मृतक के बीच बातचीत का उल्लेख था लेकिन ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं था, जिससे यह साबित हो कि जिस सिम से बातचीत हुई वही बरामद मोबाइल में इस्तेमाल हो रही थी।
पीठ ने कहा कि मोबाइल खरीदने का बिल भी साक्ष्य में मौजूद नहीं था। इसलिए सिम कार्ड को अपीलकर्ता या उसके परिवार के किसी सदस्य के मोबाइल से जोड़ने वाला कोई ठोस आधार नहीं था। इसके अलावा, बरामद मोबाइल मृतक का था यह साबित करने के लिए भी कोई साक्ष्य नहीं था।
FSL रिपोर्ट को लेकर हाईकोर्ट ने विशेष जज के निष्कर्ष को विशेष रूप से गंभीर माना। विशेष जज ने यह दर्ज किया कि मृतक के कपड़ों पर मानव रक्त मिला, जबकि FSL रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया कि मृतक के कपड़ों पर मानव रक्त के कोई निशान नहीं थे। इसके विपरीत अभियोजन गवाह सात के कपड़ों पर रक्त पाया गया।
हाईकोर्ट ने परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित मामलों में घटनाओं की पूरी कड़ी स्थापित किए जाने के सिद्धांत को दोहराया। पीठ ने शरद बिरधिचंद सारडा बनाम महाराष्ट्र राज्य के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि परिस्थितियों को ठोस रूप से साबित करना जरूरी है और सभी परिस्थितियां मिलकर ऐसी पूरी कड़ी बनानी चाहिए, जिससे अपराध के अलावा किसी अन्य निष्कर्ष की संभावना न रहे।
पीठ ने गवाह सात और गवाह 13 के बयानों की जांच के बाद पाया कि घटनाओं की कड़ी अधूरी थी। बरामद मोबाइल को मृतक से जोड़ने वाला भी कोई ठोस साक्ष्य नहीं था।
अदालत ने कहा,
“बरामद मोबाइल और बातचीत में इस्तेमाल सिम के बीच कोई ठोस संबंध स्थापित नहीं होने के कारण यह बरामदगी परिस्थितियों की कड़ी में आवश्यक कड़ी स्थापित नहीं करती। जब परिस्थितियों की कड़ी अधूरी है, तब उपलब्ध तथ्यों और साक्ष्यों का उचित मूल्यांकन किए बिना दर्ज की गई दोषसिद्धि कानून की नजर में कायम नहीं रह सकती।”
हाईकोर्ट ने माना कि विशेष जज ने साक्ष्यों का सही तरीके से मूल्यांकन नहीं किया। इसके चलते हत्या में दोषसिद्धि बरकरार रखना संभव नहीं है।
खंडपीठ ने अपील स्वीकार करते हुए दोषसिद्धि का आदेश रद्द किया और आरोपी को राहत प्रदान की। साथ ही, विशेष जज की कार्यप्रणाली और संवेदनशील मामलों की सुनवाई के लिए उनकी उपयुक्तता से जुड़े मुद्दे पर उचित निर्णय के लिए मामला एक्टिंग चीफ जस्टिस के समक्ष रखने का निर्देश दिया।


