गरीबी, अशिक्षा और कानून की जानकारी न होना चार साल की देरी माफ करने का आधार नहीं: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
Amir Ahmad
10 July 2026 5:04 PM IST

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम के तहत दायर एक दावे में चार वर्ष की देरी को माफ करने से इनकार करते हुए कहा है कि गरीबी, अशिक्षा और कानून की जानकारी का अभाव अपने-आप में देरी माफ करने के लिए 'पर्याप्त कारण' नहीं हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक पूरी देरी का संतोषजनक कारण नहीं बताया जाता, तब तक केवल इन आधारों पर विलंब को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
जस्टिस रत्नेश चंद्र सिंह बिसेन ने कर्मचारी प्रतिकर आयुक्त-सह-श्रम न्यायालय, सागर के आदेश को बरकरार रखते हुए मृतक कर्मचारी के परिजनों की अपील खारिज की।
मामला शेर खान की करंट लगने से हुई मौत से जुड़ा था। परिजनों का दावा था कि शेर खान बिजली विभाग में हेल्पर के रूप में बद्री मिश्रा के साथ काम करता था। आरोप था कि बद्री मिश्रा के कहने पर बिजली लाइन काटने के दौरान करंट लगने से उसकी मौत हो गई। घटना के बाद बद्री मिश्रा के खिलाफ आपराधिक मामला भी दर्ज हुआ।
बाद में न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी ने बद्री मिश्रा को बरी कर दिया, लेकिन अपने आदेश में यह कहा कि मृतक का परिवार उचित राहत के लिए श्रम न्यायालय या सक्षम प्राधिकारी के समक्ष जा सकता है।
इसके बाद परिवार ने कर्मचारी प्रतिकर का दावा दायर किया, लेकिन यह दावा मृत्यु के लगभग चार वर्ष बाद दाखिल किया गया, जबकि कानून के अनुसार दावा दो वर्ष के भीतर किया जाना चाहिए।
परिजनों की ओर से दलील दी गई कि वे गरीब और अशिक्षित ग्रामीण हैं तथा उन्हें अपने कानूनी अधिकारों की जानकारी नहीं थी। आपराधिक अदालत के फैसले के बाद ही उन्हें प्रतिकर मांगने के अधिकार का पता चला। इसलिए देरी को उदार दृष्टिकोण अपनाकर माफ किया जाना चाहिए, क्योंकि कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम एक कल्याणकारी कानून है।
हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार करने से इनकार करते हुए कहा कि चार वर्ष की देरी के पूरे कालखंड का कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया।
अदालत ने कहा,
"अपीलकर्ताओं ने यह कारण बताया कि वे गरीब और अशिक्षित ग्रामीण हैं तथा उन्हें कानून की जानकारी नहीं थी। लेकिन केवल गरीबी, अशिक्षा या कानून की अनभिज्ञता, अपने-आप में परिसीमा अधिनियम की धारा 5 के तहत 'पर्याप्त कारण' नहीं मानी जा सकती, विशेषकर तब जब पूरी देरी का संतोषजनक स्पष्टीकरण प्रस्तुत न किया गया हो।"
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि आपराधिक मुकदमे का लंबित रहना या उसके फैसले का इंतजार करना प्रतिकर दावा दाखिल करने में देरी का वैध आधार नहीं हो सकता। प्रतिकर मांगने का अधिकार मृतक की मृत्यु के दिन ही उत्पन्न हो जाता है और इसके लिए आपराधिक मुकदमे के परिणाम की प्रतीक्षा करना आवश्यक नहीं है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि आपराधिक अदालत द्वारा श्रम न्यायालय या अन्य सक्षम मंच के समक्ष जाने की टिप्पणी से कोई नया अधिकार उत्पन्न नहीं होता और न ही उससे पहले से समय-सीमा से बाहर हो चुका दावा पुनर्जीवित हो सकता है।
हाईकोर्ट ने कहा कि कर्मचारी प्रतिकर अधिनियम भले ही कल्याणकारी कानून है, लेकिन उसमें निर्धारित समय-सीमा की अनदेखी नहीं की जा सकती, खासकर तब जब देरी का कोई ठोस और विश्वसनीय कारण सामने न हो।
इन्हीं आधारों पर अदालत ने कर्मचारी प्रतिकर आयुक्त के आदेश को सही ठहराते हुए अपील खारिज की।


