बैंक अकाउंट में ठगी की रकम आना भर अपराध में संलिप्तता साबित नहीं करता: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
Amir Ahmad
21 Aug 2026 5:49 PM IST

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति के बैंक खाते में कथित ठगी की रकम जमा हो जाना, अपने आप में यह निष्कर्ष निकालने के लिए पर्याप्त नहीं है कि वह व्यक्ति अपराध में जानबूझकर शामिल था।
कोर्ट ने 78 वर्षीय रिटायर्ड IFS अधिकारी और पूर्व सैनिक को ठगी तथा जालसाजी के मामले में अग्रिम जमानत दी।
जस्टिस अजय कुमार निरंकारी ने कहा कि आरोपी ने बैंक खाते में रकम जमा होने के संबंध में स्पष्ट स्पष्टीकरण दिया और उसके फरार होने, सबूतों से छेड़छाड़ करने या गवाहों को प्रभावित करने की आशंका का कोई ठोस आधार रिकॉर्ड पर नहीं रखा गया।
मामला गोविंदप्पा जयरामैया बनाम मध्य प्रदेश राज्य से जुड़ा है। आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 420 और 467 समेत अन्य धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया।
अभियोजन के अनुसार, 13 जुलाई 2024 को शिकायत दर्ज कराई गई। शिकायतकर्ता का आरोप था कि कुछ लोगों ने भारतीय स्टेट बैंक लाइफ, भारती एक्सा, कोटक लाइफ और अन्य संस्थानों के प्रतिनिधि बनकर बीमा राशि दिलाने का झांसा दिया और फर्जी दस्तावेजों तथा गलत जानकारी के जरिए उससे करीब 26.11 लाख रुपये अलग-अलग बैंक अकाउंट और इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से हासिल किए।
जांच के दौरान सामने आया कि 6 जुलाई से 26 दिसंबर 2023 के बीच शिकायतकर्ता की ओर से आरोपी के बैंक खाते में कुल 15.15 लाख रुपये भेजे गए। पुलिस के अनुसार प्रथम दृष्टया यह रकम कथित अपराध की आय प्रतीत होती थी।
आरोपी की ओर से हाईकोर्ट को बताया गया कि वह वर्ष 2008 में सरकारी सेवा से रिटायर हो चुका है। वर्ष 2023 में उसे एक अज्ञात व्यक्ति के संदेश और फोन आए। उस व्यक्ति ने खुद को बीमा राशि हासिल करने में मदद करने वाला बताया।
आरोपी के अनुसार उसने बीमा की रकम मिलने की उम्मीद में उस व्यक्ति पर भरोसा किया और उसके कहने पर अपने बैंक खाते तथा डेबिट कार्ड से जुड़ी जानकारी साझा की।
बाद में 24 जून 2026 को पुलिस ने आरोपी से उसके खाते में जमा हुई रकम के संबंध में पूछताछ की। तब उसे पता चला कि मामले में उसे आरोपी नंबर 9 बनाया गया।
बचाव पक्ष ने दलील दी कि आरोपी को रकम के अकाउंट में आने या उसके बाद निकासी और इस्तेमाल के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। केवल उसके बैंक अकाउंट के माध्यम से लेनदेन होने से यह साबित नहीं होता कि वह ठगी या जालसाजी में शामिल था।
राज्य सरकार की ओर से अग्रिम जमानत का विरोध करते हुए कहा गया कि आरोपी के बैंक अकाउंट का इस्तेमाल कथित अपराध की रकम प्राप्त करने के लिए सीधे तौर पर हुआ है। यह भी दलील दी गई कि यह आर्थिक अपराध है और यह पता लगाने के लिए आरोपी से हिरासत में पूछताछ जरूरी हो सकती है कि उसके खाते का इस्तेमाल किन परिस्थितियों में और किस व्यक्ति ने किया।
हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपी ने यह स्पष्ट स्पष्टीकरण दिया है कि एक अज्ञात व्यक्ति ने बीमा राशि दिलाने के बहाने उसके बैंक और डेबिट कार्ड की जानकारी हासिल की थी।
कोर्ट ने यह भी माना कि मामले के मुख्य आरोप बैंकिंग और इलेक्ट्रॉनिक लेनदेन से संबंधित हैं जिनकी जांच दस्तावेजी और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के जरिए की जा सकती है।
कोर्ट ने कहा,
“केवल आवेदक के बैंक अकाउंट में रकम जमा होने का तथ्य अपने आप में यह निष्कर्ष निकालने के लिए पर्याप्त नहीं है कि आवेदक कथित अपराधों को अंजाम देने में जानबूझकर शामिल था।”
पीठ ने यह भी कहा कि मौजूदा चरण में आरोपी को हिरासत में लेकर पूछताछ करना अनिवार्य है ऐसा साबित नहीं हुआ।
अदालत ने आरोपी की अधिक उम्र, उसके रिटायर्ड IFS अधिकारी और पूर्व सैनिक होने तथा उसके खिलाफ किसी पूर्व आपराधिक मामले का रिकॉर्ड नहीं होने को भी ध्यान में रखा। इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने उसे अग्रिम जमानत देना उचित माना।


