पीड़िता के मुकरने से ही जमानत का आधार नहीं बनता: मेडिकल रिपोर्ट में यौन अपराध की पुष्टि तो एमपी हाईकोर्ट ने जमानत ठुकराई
Amir Ahmad
20 Aug 2026 4:22 PM IST

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने नाबालिग लड़की के अपहरण और दुष्कर्म के आरोपी की नियमित जमानत याचिका खारिज की।
अदालत ने कहा कि केवल पीड़िता के मुकदमे के दौरान अपने बयान से मुकर जाने से आरोपी को जमानत का अधिकार नहीं मिल जाता, खासकर तब जब मेडिकल साक्ष्य दुष्कर्म की पुष्टि करते हों।
जस्टिस अजय कुमार निरंकारी की पीठ ने कहा कि आपराधिक मुकदमा सत्य की तलाश की प्रक्रिया है। आरोपी या पीड़िता में से किसी को भी झूठ या अन्य तरीकों से मुकदमे की प्रक्रिया को प्रभावित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
मामले के अनुसार नाबालिग लड़की 29 अक्टूबर 2025 को लापता हुई। अगले दिन उसके परिजनों ने इसकी रिपोर्ट दर्ज कराई। पुलिस ने 11 नवंबर 2025 को उसे भोपाल से बरामद किया। उस समय आरोपी भी उसके साथ था।
अभियोजन के अनुसार दंड प्रक्रिया से संबंधित धाराओं के तहत दर्ज अपने बयानों में पीड़िता ने बताया कि वह अपनी मर्जी से घर से निकली थी और आरोपी के साथ रह रही थी। उसने यह भी आरोप लगाया कि आरोपी ने उसके साथ दुष्कर्म किया।
आरोपी की ओर से अदालत में कहा गया कि वह और पीड़िता एक-दूसरे को जानते थे तथा दोनों के बीच प्रेम और लगाव था।
बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि विचारण अदालत के सामने बयान देते समय पीड़िता ने अभियोजन की कहानी का समर्थन नहीं किया और आरोपी की पहचान करने से इनकार किया।
आरोपी की ओर से यह भी बताया गया कि वह 14 नवंबर 2025 से जेल में है और इसी आधार पर उसे जमानत देने की मांग की गई।
राज्य सरकार ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि भले ही पीड़िता विचारण के दौरान अपने बयान से मुकर गई हो लेकिन मेडिकल रिपोर्ट अभियोजन के मामले का समर्थन करती है।
राज्य की ओर से यह भी बताया गया कि घटना के समय पीड़िता की उम्र 16 वर्ष थी।
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री पर गौर करते हुए कहा कि पीड़िता के लापता होने के समय उसकी उम्र 15 वर्ष थी। अपने पूर्व बयानों में उसने आरोपी पर जबरन दुष्कर्म करने का स्पष्ट आरोप लगाया और यह आरोप मेडिकल रिपोर्ट से भी पुष्ट होता है।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के हेमुदन नानभा गढ़वी बनाम गुजरात राज्य के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि चिकित्सकीय साक्ष्य यौन हमले की पुष्टि नहीं करते, पहचान संदिग्ध होती और अन्य पुष्टिकारक साक्ष्य भी उपलब्ध नहीं होते, तो स्थिति अलग हो सकती थी। लेकिन जब अन्य मजबूत साक्ष्य मौजूद हों तब केवल पीड़िता के मुकर जाने के आधार पर आरोपी को राहत देना उचित नहीं होगा।
जस्टिस अजय कुमार निरंकारी ने कहा,
“आपराधिक मुकदमा सत्य की तलाश है। आरोपी और पीड़ित, दोनों को झूठ बोलकर या किसी तरह की चाल से मुकदमे की प्रक्रिया को प्रभावित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।”
अदालत ने कहा कि आपराधिक न्याय व्यवस्था में आरोपी की निर्दोषता की धारणा महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके साथ पीड़ित के अधिकारों और कानून के शासन को बनाए रखने वाले सामाजिक हितों के बीच संतुलन भी जरूरी है।
पीठ ने यह भी कहा कि केवल प्रमुख अभियोजन गवाह के मुकर जाने को बरी करने का आधार मानकर आपराधिक मुकदमे को मजाक नहीं बनाया जा सकता।
अदालत ने स्पष्ट किया कि हर मामले में साक्ष्यों का मूल्यांकन उसके तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर किया जाना चाहिए।
इन परिस्थितियों और मेडिकल साक्ष्य को देखते हुए हाईकोर्ट ने आरोपी की नियमित जमानत याचिका खारिज की।


