जिस व्यक्ति के खिलाफ जनहित याचिका दायर की, उसी की ओर से अदालत में पैरवी: एमपी हाईकोर्ट ने BCI से मांगी जांच रिपोर्ट
Amir Ahmad
24 July 2026 1:18 PM IST

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने एक वकील के आचरण पर गंभीर सवाल उठाते हुए बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) से यह जांच करने को कहा कि क्या उनका व्यवहार पेशेवर कदाचार की श्रेणी में आता है। मामला उस स्थिति से जुड़ा है, जिसमें एडवोकेट ने पहले एक अधिकारी के खिलाफ जनहित याचिकाएं दायर कीं और बाद में उसी अधिकारी की ओर से दूसरे मामलों में अदालत में पैरवी की।
एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की खंडपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता एडवोकेट ने वर्ष 2025 में मध्यप्रदेश निजी विश्वविद्यालय विनियामक आयोग के प्रशासनिक सदस्य डॉ. विश्वास चौहान की नियुक्ति की जांच की मांग करते हुए जनहित याचिकाएं दायर कीं। लेकिन इन याचिकाओं के लंबित रहने के दौरान उन्होंने वर्ष 2026 में डॉ. चौहान की ओर से दो रिट याचिकाओं में एडवोकेट के रूप में पैरवी की।
अदालत ने कहा,
"जब याचिकाकर्ता ने डॉ. विश्वास कुमार चौहान को प्रतिवादी बनाकर उनके खिलाफ आरोप लगाए, तब उन्हें बाद में उनकी ओर से अधिवक्ता के रूप में पैरवी स्वीकार नहीं करनी चाहिए। यह जांच का विषय है कि क्या यह पेशेवर कदाचार की श्रेणी में आता है।"
खंडपीठ ने यह भी कहा कि ऐसी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि जनहित याचिकाओं में शामिल कई जानकारियां और तथ्य संबंधित अधिकारी से ही प्राप्त किए गए हों, जबकि याचिका में इस संबंध में आवश्यक जानकारी नहीं दी गई।
मामले के अनुसार एडवोकेट ने सबसे पहले आयोग के अध्यक्ष, सचिव तथा प्रशासनिक एवं शैक्षणिक सदस्यों की नियुक्तियों को चुनौती देते हुए लोकायुक्त का दरवाजा खटखटाया था। लोकायुक्त द्वारा शिकायतें बंद किए जाने के बाद उन्होंने वर्ष 2025 में हाईकोर्ट में तीन अलग-अलग जनहित याचिकाएं दायर कर नियुक्तियों की जांच की मांग की।
इसी बीच डॉ. विश्वास चौहान के खिलाफ वसूली की कार्रवाई शुरू हुई और 23 मार्च 2026 को एडवोकेट उनकी ओर से अदालत में पेश हुए।
राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि जिन नियुक्तियों को चुनौती दी गई, वे वर्ष 2020 में हुई थीं और नवंबर 2025 में आयोग में नए अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति हो चुकी है। यह भी बताया गया कि संबंधित कर्मचारी लंबे समय से आयोग में कार्यरत हैं और अपने सेवा जीवन के अंतिम चरण में हैं।
हाईकोर्ट ने पाया कि सक्षम प्राधिकारी लोकायुक्त पहले ही नियुक्तियों की जांच कर शिकायतों का निस्तारण कर चुका है। इस आधार पर अदालत ने जनहित याचिकाओं का निपटारा कर दिया।
साथ ही अदालत ने प्रत्येक याचिका पर 25-25 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया और BCI को एडवोकेट के आचरण की जांच करने का निर्देश दिया।


