पिता से विरासत में मिली संपत्ति से अपने आप नहीं बनता संयुक्त हिंदू परिवार, बाद में खरीदी संपत्ति भी संयुक्त नहीं मानी जा सकती: एमपी हाईकोर्ट
Amir Ahmad
17 Sept 2026 5:31 PM IST

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि केवल इस आधार पर कि भाइयों को पिता से कुछ संपत्ति संयुक्त रूप से विरासत में मिली है, यह मान लेना उचित नहीं है कि वे संयुक्त हिंदू परिवार या सहदायिकी के सदस्य हैं।
अदालत ने स्पष्ट किया कि संयुक्त रूप से विरासत में मिली संपत्ति का होना और संयुक्त हिंदू परिवार या सहदायिकी का अस्तित्व, दोनों अलग-अलग बातें हैं। केवल विरासत में मिली संपत्ति के संयुक्त रूप से दर्ज होने से बाद में खरीदी गई हर संपत्ति को संयुक्त परिवार की संपत्ति नहीं माना जा सकता।
जस्टिस विवेक जैन की पीठ ने ट्रायल कोर्ट के उस दृष्टिकोण से असहमति जताई, जिसमें भाइयों द्वारा पिता से संयुक्त रूप से संपत्ति विरासत में मिलने के आधार पर उनके बीच संयुक्त हिंदू परिवार और सहदायिकी की धारणा बना ली गई।
मामले में दो भाइयों ने वाद दायर कर अपने मृत भाई द्वारा वसीयत के जरिए वादी नंबर-1 के पक्ष में संपत्तियां दिए जाने को निरस्त करने की मांग की। इसके साथ ही विभिन्न जमीनों पर स्वामित्व की घोषणा और बहन तथा उसके पति को कब्जे में हस्तक्षेप करने से रोकने के लिए स्थायी निषेधाज्ञा की मांग की गई। ट्रायल कोर्ट ने मामले में बहन को पक्षकार के रूप में अलग करते हुए परिवार को हिंदू अविभाजित परिवार माना था, जिसके खिलाफ अपील की गई।
हाईकोर्ट में अपीलकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि ट्रायल कोर्ट ने केवल इसलिए हिंदू अविभाजित परिवार के अस्तित्व की धारणा बना ली, क्योंकि तीन भाइयों को कुछ संपत्ति संयुक्त रूप से विरासत में मिली थी। दलील दी गई कि किसी संपत्ति का कई लोगों के नाम संयुक्त रूप से होना और सहदायिकी का अस्तित्व अलग-अलग कानूनी अवधारणाएं हैं।
दूसरी ओर, वादियों ने कहा कि उनके पिता की मृत्यु हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 लागू होने से पहले हुई है और उस समय प्रचलित हिंदू कानून के तहत संपत्ति तीनों बेटों को मिली। उनका तर्क था कि संपत्ति का बंटवारा नहीं होने के कारण संयुक्त हिंदू परिवार बना रहा।
हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि पिता की मृत्यु के बाद प्रत्येक उत्तराधिकारी अपने अधिकार से संपत्ति में हिस्सा प्राप्त करता है। यदि राजस्व अभिलेखों में सभी के नाम संयुक्त रूप से दर्ज हैं तो इससे यह संकेत मिल सकता है कि संपत्ति का बंटवारा नहीं हुआ है और प्रत्येक व्यक्ति का उसमें अलग हिस्सा है। लेकिन केवल इस आधार पर सहदायिकी या संयुक्त हिंदू परिवार के अस्तित्व की धारणा नहीं बनाई जा सकती।
अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि वादियों ने अपनी मूल याचिका में कहीं संयुक्त हिंदू परिवार के अस्तित्व का दावा नहीं किया। इसके बजाय उन्होंने संपत्ति को तीनों भाइयों की संयुक्त मिल्कियत बताया। राजस्व अभिलेखों में भी विरासत में मिली जमीन तीनों भाइयों के संयुक्त नाम पर दर्ज है।
हाईकोर्ट ने यह भी गौर किया कि वादियों के अनुसार दो भाई रोजी-रोटी कमाने के लिए ऋषिकेश चले गए थे और उन्होंने तीसरे भाई को कथित तौर पर पैसे भेजे थे जिनसे उसके नाम पर अतिरिक्त संपत्तियां खरीदी गईं। हालांकि, इन कथित रकम के हस्तांतरण, भाइयों की आय या संपत्ति खरीद में उनके योगदान के संबंध में कोई दस्तावेजी साक्ष्य पेश नहीं किया गया।
पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के 2007 के अप्पासाहेब पीरप्पा चामडगाडे बनाम देवेंद्र पीरप्पा चामडगाडे फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि संयुक्त हिंदू परिवार के अस्तित्व की कोई स्वत: धारणा नहीं बनाई जा सकती और जो व्यक्ति किसी संपत्ति को संयुक्त हिंदू परिवार की संपत्ति बताता है, प्रारंभिक रूप से उसे इसका आधार साबित करना होता है।
मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि संयुक्त हिंदू परिवार के गठन या अस्तित्व को साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं थे। हालांकि पिता से विरासत में मिली पांच संपत्तियां तीनों भाइयों के नाम संयुक्त रूप से दर्ज थीं और उनका बंटवारा नहीं हुआ था लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि बाद में भाइयों द्वारा अर्जित सभी संपत्तियां संयुक्त परिवार की संपत्ति थीं।
अदालत ने इसलिए तीसरे मृत भाई के जीवनकाल में उसके नाम पर खरीदे गए पांच सर्वे नंबरों को उसकी व्यक्तिगत संपत्ति माना। वादियों को इन संपत्तियों को संयुक्त परिवार की संपत्ति घोषित कराने का अधिकार नहीं मिला।
हालांकि, अदालत ने तीसरे भाई की मृत्यु से करीब पांच दिन पहले कथित तौर पर बनाई गई वसीयत पर भी विचार किया। वसीयत पंजीकृत नहीं थी, हालांकि उसे नोटरीकृत किया गया था और उस पर दो गवाहों के हस्ताक्षर थे। हाईकोर्ट ने वसीयत से जुड़ी परिस्थितियों को संदिग्ध माना और ट्रायल कोर्ट के उस निष्कर्ष को बरकरार रखा कि वसीयत वैध नहीं थी।
इसके परिणामस्वरूप अदालत ने माना कि पिता की संपत्ति में तीसरे मृत भाई का हिस्सा उसके दो भाइयों और बहन के बीच बराबर बंटेगा। तीनों को एक-एक तिहाई हिस्सा मिलेगा। इस आधार पर हाईकोर्ट ने अपील को आंशिक रूप से मंजूर करते हुए मामले का निपटारा किया।


