हिरासत में कैदी की मौत के मामले में पर्यवेक्षी पद पर होना अपने आप में आपराधिक जिम्मेदारी का सबूत नहीं: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
Amir Ahmad
12 Oct 2026 5:03 PM IST

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने हिरासत में एक कैदी की मौत के मामले में आरोपी पुलिस अधिकारी को जमानत दी।
अदालत ने कहा कि घटना के समय किसी पुलिस अधिकारी का पर्यवेक्षी पद पर होना एक प्रासंगिक तथ्य जरूर है, लेकिन केवल इसी आधार पर उसकी व्यक्तिगत आपराधिक जिम्मेदारी साबित नहीं की जा सकती।
जस्टिस आलोक अवस्थी की पीठ ने कहा कि हिरासत की निगरानी से जुड़ी जिम्मेदारी और किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत आपराधिक जवाबदेही के बीच अंतर करना जरूरी है। किसी अधिकारी का वरिष्ठ या पर्यवेक्षी पद अपने आप में उस पर लगाए गए विशिष्ट आरोपों के आवश्यक तत्वों को साबित करने का विकल्प नहीं हो सकता।
यह अपील अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम (SC/ST Act) की धारा 14ए(2) के तहत विशेष न्यायाधीश के उस आदेश को चुनौती देते हुए दायर की गई, जिसमें आरोपी की नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी गई। आरोपी 5 अक्टूबर 2025 से हिरासत में था। उस पर हत्या, स्वेच्छा से चोट पहुंचाने और गलत तरीके से बंधक बनाने से संबंधित आरोप लगाए गए।
मामला देवा नामक कैदी की मौत से जुड़ा है। उसकी मौत को लेकर लिखित शिकायत दर्ज कराई गई थी। संदिग्ध और असामान्य परिस्थितियों में हुई मौत के बाद न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी ने जांच की।
इस जांच में सामने आया कि पुलिस हिरासत के दौरान कथित यातना और लापरवाही के कारण कैदी की असामान्य परिस्थितियों में मौत हुई थी। इसके बाद आरोपी पुलिस अधिकारी और सात से आठ अन्य पुलिसकर्मियों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया।
सुप्रीम कोर्ट के हंसुरा बाई बनाम मध्य प्रदेश राज्य मामले में दिए गए आदेश के अनुपालन में जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंप दी गई। जांच पूरी होने के बाद सीबीआई ने सह-आरोपी देवराज, जुबेर खान और गजराज सिंह यादव के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया। फरार आरोपियों संजीत सिंह मवई और उत्तम सिंह के खिलाफ पूरक आरोपपत्र भी दाखिल किया गया।
आरोपी अधिकारी की ओर से दलील दी गई कि घटना वाले दिन वह आधिकारिक वीआईपी ड्यूटी पर था और पुलिस थाने में मौजूद नहीं था। वहीं, CBI ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि आरोपी की संलिप्तता दर्शाने के लिए पर्याप्त मौखिक, दस्तावेजी और डिजिटल साक्ष्य उपलब्ध हैं।
अदालत ने रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए पाया कि मृतक को 13 जुलाई को हिरासत में लिया गया। उस समय आरोपी अधिकारी शहर से बाहर ड्यूटी पर था और 14 जुलाई को पुलिस थाने लौटा था।
अदालत ने कहा कि आरोपी की अनुपस्थिति के दौरान मृतक से कई पुलिस अधिकारी लगातार पूछताछ कर रहे थे। इस दौरान उसके साथ कई बार शारीरिक मारपीट किए जाने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
अदालत के अनुसार, आरोपी पर आरोप था कि उसने कथित घटनाओं में भाग लिया, उन्हें अंजाम देने में मदद की, निर्देश दिए या उन्हें रोकने में विफल रहा।
हालांकि, पीठ ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि आरोपी करीब एक साल से हिरासत में था और जांच एजेंसी आरोपपत्र दाखिल कर चुकी थी। ऐसे में अब उससे हिरासत में रखकर पूछताछ करने की आवश्यकता नहीं रह गई।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि अभियोजन का मामला दस्तावेजों, सीसीटीवी रिकॉर्डिंग, आधिकारिक अभिलेखों, मेडिकल साक्ष्यों और गवाहों के बयानों पर आधारित है। चूंकि जांच पूरी हो चुकी है और आरोपपत्र दाखिल किया जा चुका है, इसलिए आरोपी को जमानत दिए जाने का आधार बनता है।
इन्हीं परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने आरोपी पुलिस अधिकारी की जमानत याचिका स्वीकार कर ली।

