सरकारी कर्मचारी से जमानतदार की शर्त लगाना जमानत से वंचित करने जैसा: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने दो युवकों की रिहाई का दिया आदेश

Amir Ahmad

27 July 2026 3:40 PM IST

  • सरकारी कर्मचारी से जमानतदार की शर्त लगाना जमानत से वंचित करने जैसा: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने दो युवकों की रिहाई का दिया आदेश

    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति की जमानत इस शर्त पर मंजूर की जाए कि उसके लिए कोई सरकारी कर्मचारी जमानतदार बने, जबकि ऐसी शर्त पूरी कर पाना व्यवहारिक रूप से संभव न हो, तो यह वास्तव में जमानत से वंचित करने के समान है।

    जस्टिस सुबोध अभ्यंकर और जस्टिस आलोक अवस्थी की खंडपीठ ने राष्ट्रीय शिक्षित युवा संघ के दो सदस्यों की ओर से दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार करते हुए उनकी रिहाई का आदेश दिया।

    मामला उन दो युवकों से जुड़ा है, जिन्हें राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET) प्रश्नपत्र लीक मामले को लेकर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों के समर्थन में प्रस्तावित प्रदर्शन की अनुमति मांगने के बाद पुलिस ने हिरासत में ले लिया था।

    याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उन्होंने 23 जुलाई 2026 को शांतिपूर्ण जुलूस निकालने के लिए सहायक पुलिस आयुक्त को आवेदन दिया। लेकिन अनुमति देने के बजाय पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया।

    राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि दोनों को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 170 के तहत एहतियाती कार्रवाई के रूप में हिरासत में लिया गया। साथ ही सहायक पुलिस आयुक्त के आदेश के अनुसार उनकी रिहाई के लिए कुछ शर्तें निर्धारित की गईं।

    याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि जमानत की सबसे महत्वपूर्ण शर्त यह थी कि किसी सरकारी कर्मचारी को जमानतदार बनना होगा। यह शर्त पूरी करना उनके लिए लगभग असंभव है, इसलिए यह आदेश व्यवहारिक रूप से उनकी रिहाई का रास्ता बंद कर देता है।

    वहीं राज्य सरकार ने तर्क दिया कि वर्ष 2024 में दोनों का आचरण देखते हुए यह शर्त लगाई गई। सरकार के अनुसार, उस समय उन्होंने हिंसक प्रदर्शन कर शांति व्यवस्था भंग करने का प्रयास किया।

    हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसा मानना कठिन है कि अपनी नौकरी को लेकर चिंतित कोई सरकारी कर्मचारी ऐसे मामलों में जमानतदार बनने के लिए आगे आएगा। इसलिए इस प्रकार की शर्त वास्तविक रूप से पूरी किए जाने योग्य नहीं है।

    अदालत ने कहा,

    "सरकारी कर्मचारी से जमानत बंधपत्र प्रस्तुत कराने की शर्त ऐसी है, जिसे बंदी के लिए पूरा कर पाना संभव नहीं दिखता। इस प्रकार की शर्त लगाना वस्तुतः जमानत से इनकार करने के समान है।"

    खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि कठोर और बोझिल जमानत शर्तें केवल असाधारण परिस्थितियों में ही लगाई जा सकती हैं। इन्हें सामान्य नियम के रूप में लागू नहीं किया जा सकता।

    इन्हीं टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका मंजूर करते हुए दोनों युवकों को ₹50,000 के व्यक्तिगत मुचलके और एक-एक सक्षम जमानतदार प्रस्तुत करने पर तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया।

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