वकील पर निगरानी रखना पक्षकार का कर्तव्य नहीं : एडवोकेट की गैर-हाजिरी पर पारित एकतरफा आदेश को मध्य प्रदेश हाइकोर्ट ने वापस लिया
Amir Ahmad
21 Jan 2026 12:19 PM IST

मध्य प्रदेश हाइकोर्ट ने महत्वपूर्ण आदेश में कहा कि जब कोई पक्षकार किसी एडवोकेट को नियुक्त करता है तो वह इस सद्भावना विश्वास के साथ करता है कि वकील प्रत्येक तारीख पर उसका प्रतिनिधित्व करेगा। ऐसे में मुकदमेबाज से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह अपने वकील पर हर तारीख को निगरानी रखने वाला प्रहरी बनकर नजर रखे।
जस्टिस पवन कुमार द्विवेदी की पीठ ने यह टिप्पणी उस आवेदन को स्वीकार करते हुए की, जिसमें वकील की लगातार गैर-हाजिरी के कारण पारित एकतरफा फैसले को वापस लेकर दूसरी अपील की पुनः सुनवाई की मांग की गई।
मामला
यह मामला संपत्ति विवाद से जुड़ा था जिसमें परिवार के दो उत्तराधिकारियों ने वाद संपत्ति में अपने स्वामित्व की घोषणा और बंटवारे की मांग की थी। अपीलीय अदालत द्वारा उनके हिस्से को कम किए जाने के फैसले को चुनौती देते हुए दूसरी अपील दायर की गई।
हालांकि, दूसरी अपील के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकील ने अचानक अदालत में पेश होना बंद कर दिया और न तो मामले की अगली तारीखों की जानकारी दी और न ही अपनी अनुपस्थिति के बारे में याचिकाकर्ताओं को अवगत कराया। इसके चलते हाइकोर्ट ने एकतरफा फैसला पारित कर दिया, जिससे अपीलीय अदालत का निर्णय बरकरार रहा।
याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि उन्होंने विधिवत रूप से एडवोकेट नियुक्त किया, जिसने प्रारंभ में उनकी ओर से पेश होकर पैरवी भी की। हालांकि, बाद में वह बिना किसी सूचना के अनुपस्थित हो गया। उन्होंने कहा कि उन्हें इस एकतरफा आदेश की जानकारी 15 अप्रैल 2025 को मिली।
याचिकाकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि पूर्व वकील की लापरवाही के कारण ही यह स्थिति उत्पन्न हुई और उसकी अनुपस्थिति का कोई संतोषजनक कारण नहीं बताया गया।
दूसरी ओर प्रतिवादियों ने कहा कि याचिकाकर्ता जानबूझकर अदालत में उपस्थित नहीं हुए। उनका यह भी कहना था कि याचिकाकर्ताओं को 15 अप्रैल 2025 को आदेश की जानकारी मिल चुकी थी इसके बावजूद उन्होंने 28 अगस्त 2025 तक पुनः सुनवाई के लिए कोई आवेदन नहीं किया।
हाइकोर्ट ने रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए कहा कि याचिकाकर्ताओं ने एक एडवोकेट नियुक्त किया था, जो 9 अक्टूबर, 2015 तक उनकी ओर से पेश होता रहा। हालांकि 14 जनवरी 2016 के बाद उसने पेश होना बंद कर दिया। अदालत ने यह भी नोट किया कि ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं है जिससे यह साबित हो कि याचिकाकर्ताओं को अपील की अगली तारीखों की जानकारी दी गई।
खंडपीठ ने यह भी कहा कि वकील की लगातार अनुपस्थिति के बावजूद अदालत द्वारा कोई एसपीसी नोटिस जारी नहीं किया गया।
जस्टिस पवन कुमार द्विवेदी ने कहा,
“एक बार जब कोई पक्षकार एडवोकेट को नियुक्त कर लेता है तो यह उसका सद्भावनापूर्ण विश्वास होता है कि वकील प्रत्येक तारीख पर उसका प्रतिनिधित्व करेगा। यह मुकदमेबाज का कर्तव्य नहीं है कि वह हर तारीख पर अपने अधिवक्ता की निगरानी करे।”
हाइकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों रफीक बनाम मुंशीलाल और राम कुमार गुप्ता बनाम हर प्रसाद पर भरोसा करते हुए कहा कि वकील की गलती या चूक के कारण पक्षकार को दंडित नहीं किया जा सकता।
इन परिस्थितियों को देखते हुए हाइकोर्ट ने आदेश 41 नियम 21 के तहत दायर आवेदन स्वीकार करते हुए दूसरी अपील की पुनः सुनवाई की अनुमति दी और एकतरफा पारित आदेश वापस ले लिया।

