लोक सेवाओं के लिए शैक्षणिक योग्यता तय करने से राज्य सरकार को नहीं रोक सकता UGC : मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
Amir Ahmad
8 July 2026 3:15 PM IST

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) और उसके विनियम राज्य सरकार को लोक सेवाओं में नियुक्ति के लिए आवश्यक शैक्षणिक योग्यता निर्धारित करने से नहीं रोक सकते।
अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी पद के लिए योग्यता तय करना पूरी तरह भर्ती नीति का विषय है और राज्य, नियोक्ता होने के नाते, अपनी आवश्यकता के अनुरूप पात्रता की शर्तें निर्धारित करने का अधिकार रखता है।
जस्टिस जय कुमार पिल्लै की पीठ ने यह टिप्पणी सहायक प्राध्यापक (प्राणी विज्ञान) के पद पर नियुक्ति से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान की।
मामले में एक अभ्यर्थी ने दावा किया था कि उसके पास कृषि विषय में कीट विज्ञान से परास्नातक की डिग्री है, जिसे उसने प्राणी विज्ञान का संबद्ध विषय बताते हुए UGC के वर्ष 2018 के विनियमों का हवाला दिया। उसने अदालत से उसे अन्य पिछड़ा वर्ग श्रेणी के तहत सहायक प्राध्यापक (प्राणी विज्ञान) पद के लिए पात्र मानने तथा साक्षात्कार एवं अंतिम चयन प्रक्रिया में शामिल करने का निर्देश देने की मांग की थी।
हालांकि, हाईकोर्ट ने उसकी दलील स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
अदालत ने कहा,
"किसी पद के लिए शैक्षणिक योग्यता निर्धारित करना पूरी तरह भर्ती नीति का विषय है। राज्य, नियोक्ता के रूप में, पात्रता की विशिष्ट शर्तें तय करने का पूरा अधिकार रखता है। उसे कार्य की प्रकृति, आवश्यक दक्षता और इस बात का ध्यान रखना होता है कि अभ्यर्थी विद्यार्थियों को मूल विषय प्राणी विज्ञान प्रभावी ढंग से पढ़ा सके।"
पीठ ने यह भी कहा कि अभ्यर्थी का यूजीसी विनियमों और राज्य पात्रता परीक्षा (सेट)-2024 उत्तीर्ण होने का आधार लेना उचित नहीं है।
अदालत के अनुसार,
"नेट या सेट केवल पात्रता परीक्षा है। इससे किसी विशेष पद के लिए स्वतः पात्रता प्राप्त नहीं हो जाती। इसके अलावा, यूजीसी के पास राज्य सरकार को उसकी लोक सेवाओं की आवश्यकताओं के अनुरूप शैक्षणिक योग्यता निर्धारित करने से रोकने का अधिकार नहीं है।"
मामले के अनुसार उच्च शिक्षा विभाग की मांग पर मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग ने 30 दिसंबर, 2022 को सहायक प्राध्यापक पदों के लिए विज्ञापन जारी किया था। याचिकाकर्ता ने अन्य पिछड़ा वर्ग श्रेणी में आवेदन किया और प्रारंभिक रूप से चयनित भी हुआ। दस्तावेजों की जांच के बाद उसकी उम्मीदवारी यह कहते हुए खारिज कर दी गई कि उसके पास विज्ञापन में निर्धारित शैक्षणिक योग्यता नहीं है।
याचिकाकर्ता ने इस निर्णय के खिलाफ आपत्ति भी दर्ज कराई, लेकिन आयोग ने यह कहते हुए उसकी उम्मीदवारी अस्वीकार कर दी कि उसके परास्नातक और शोध उपाधि कृषि विषय में हैं तथा उसकी नेट योग्यता भी कृषि विषय में है, इसलिए वह प्राणी विज्ञान के पद के लिए पात्र नहीं है।
हाईकोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत न्यायिक समीक्षा की सीमाएं तय हैं और अदालत किसी शैक्षणिक विशेषज्ञ संस्था की तरह डिग्रियों की समकक्षता का मूल्यांकन नहीं कर सकती।
अदालत ने विज्ञापन का उल्लेख करते हुए कहा कि उसमें स्पष्ट रूप से प्राणी विज्ञान या उससे संबंधित निर्धारित संबद्ध विषय में परास्नातक डिग्री तथा जीवन विज्ञान विषय में नेट योग्यता अनिवार्य थी।
याचिकाकर्ता के पास निर्धारित मुख्य या संबद्ध विषय में आवश्यक परास्नातक डिग्री नहीं थी।
राज्य सरकार की इस दलील को स्वीकार करते हुए कि भर्ती प्रक्रिया के दौरान विज्ञापन की शर्तों में लचीली व्याख्या नहीं की जा सकती, अदालत ने कहा,
"यदि चयन प्रक्रिया के बीच इस प्रकार की लचीली व्याख्या की अनुमति दी जाए, तो यह जनता के साथ छल होगा और संविधान के अनुच्छेद 14 तथा 16 में निहित समानता के सिद्धांत का उल्लंघन होगा।"
इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने माना कि संबंधित अधिकारियों की कार्रवाई में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है और सभी याचिकाएं खारिज की।


