12 साल की बच्ची के शोर नहीं मचाने को हाईकोर्ट ने माना अस्वाभाविक, दुष्कर्म के प्रयास के आरोपी की बरी बरकरार

Amir Ahmad

27 Aug 2026 3:01 PM IST

  • 12 साल की बच्ची के शोर नहीं मचाने को हाईकोर्ट ने माना अस्वाभाविक, दुष्कर्म के प्रयास के आरोपी की बरी बरकरार

    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 12 साल की बच्ची से गलत हरकत करने के प्रयास के मामले में आरोपी की बरी किए जाने का फैसला बरकरार रखा। जस्टिस जय कुमार पिल्लई की पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ अपराध साबित करने में सफल नहीं रहा।

    अदालत ने घटना के दौरान बच्ची के शोर नहीं मचाने, उसके शरीर पर चोट के निशान नहीं होने और किसी स्वतंत्र गवाह की जांच नहीं किए जाने सहित कई परिस्थितियों को अभियोजन की कहानी के खिलाफ माना।

    पीठ ने कहा कि यदि किसी बच्ची को जबरन गलत हरकत के लिए खींचा जा रहा हो और वह मदद के लिए चिल्लाए तक नहीं, तो यह परिस्थिति स्वाभाविक नहीं लगती। अदालत के अनुसार घटना के समय किसी तरह का शोर या चीख-पुकार नहीं होना अभियोजन की कहानी को अत्यंत संदिग्ध बनाता है।

    मामले में राज्य और पीड़िता की ओर से अलग-अलग अपील दायर कर निचली अदालत के उस फैसले को चुनौती दी गई, जिसमें आरोपी को POCSO Act के तहत लगाए गए आरोपों से बरी कर दिया गया।

    अभियोजन के अनुसार 5 मार्च 2021 को शाम करीब पांच बजे 12 वर्षीय बच्ची अपने घर के बाहर खुले आंगन में झाड़ू लगा रही थी। इसी दौरान उसका पड़ोसी आरोपी वहां आया और कथित रूप से उसका दायां हाथ पकड़कर उसके साथ गलत हरकत करने की बात कही। आरोप था कि इसके बाद वह बच्ची को पास की नाली की ओर खींचकर ले गया और उसके साथ गलत हरकत करने का प्रयास किया।

    बच्ची ने कथित तौर पर विरोध करते हुए अपना हाथ छुड़ाया और हैंडपंप की ओर भाग गई। वहां उसने अपने भाई को घटना के बारे में बताया। भाई ने फोन पर माता-पिता को जानकारी दी, जिसके बाद परिवार ने पुलिस से संपर्क कर शिकायत दर्ज कराई। उसी दिन बच्ची की मेडिकल जांच कराई गई और 25 मार्च 2021 को आरोपी के खिलाफ आरोपपत्र अदालत में पेश किया गया।

    राज्य की ओर से दलील दी गई कि निचली अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों का उचित तरीके से विश्लेषण नहीं किया और परिवारों के बीच पहले से चले आ रहे विवाद के आधार पर अभियोजन की कहानी पर संदेह किया। राज्य ने सुप्रीम कोर्ट के विजय बनाम मध्य प्रदेश राज्य के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि यदि पीड़िता की गवाही पूरी तरह विश्वसनीय हो तो केवल उसके बयान के आधार पर भी दोषसिद्धि की जा सकती है।

    आरोपी की ओर से इस दलील का विरोध करते हुए कहा गया कि अभियोजन के गवाहों के बयानों में महत्वपूर्ण विरोधाभास हैं और आरोप संदेह से परे साबित नहीं हुए।

    हाईकोर्ट ने पाया कि घटना से एक दिन पहले पीड़िता के पिता और आरोपी के पिता के बीच विवाद हुआ था। पीड़िता ने अपने बयान में यह भी बताया कि इसी विवाद के बाद उसके पिता ने आरोपी के खिलाफ पुलिस में शिकायत की थी। अदालत ने माना कि निचली अदालत का यह देखना उचित था कि कहीं प्राथमिकी पहले से चले आ रहे विवाद का परिणाम तो नहीं थी।

    पीठ ने यह स्पष्ट किया कि पीड़िता की अकेली गवाही के आधार पर दोषसिद्धि संभव है लेकिन ऐसी गवाही में अदालत का पूरा और अडिग विश्वास होना जरूरी है। मौजूदा मामले में अदालत को अभियोजन की कहानी में कई महत्वपूर्ण कमियां मिलीं।

    अदालत ने विशेष रूप से उस नाली का उल्लेख किया, जहां बच्ची को ले जाने का आरोप लगाया गया। पीठ ने कहा कि आधिकारिक मौका नक्शे में नाली का स्थान ही स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं किया गया।

    हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि यदि आरोपी का वास्तव में गलत हरकत करने का इरादा था तो उसके पास पीड़िता का घर जो अपेक्षाकृत एकांत स्थान था वहां उपलब्ध था। इसके बजाय अभियोजन के अनुसार उसे ऐसे स्थान की ओर खींचकर ले जाया गया, जो सार्वजनिक और लोगों की आवाजाही वाला क्षेत्र था। अदालत ने इस परिस्थिति को अभियोजन की कहानी के अनुरूप नहीं माना।

    पीठ ने पीड़िता की उम्र करीब साढ़े 12 साल और आरोपी की उम्र 23 साल होने का भी उल्लेख किया। अदालत के अनुसार यदि बच्ची ने कथित तौर पर आरोपी से अपना हाथ छुड़ाने के लिए संघर्ष किया था तो उसके हाथ या शरीर पर घर्षण अथवा अन्य चोट के निशान मिलने की संभावना थी। लेकिन मेडिकल रिपोर्ट में उसके शरीर पर चोट के निशान नहीं पाए गए।

    अदालत ने यह भी गौर किया कि घटना का स्थान घनी आबादी वाला और व्यस्त आवासीय क्षेत्र था। इसके बावजूद जांच अधिकारी ने किसी स्वतंत्र स्थानीय व्यक्ति को गवाह नहीं बनाया। पीठ ने इसे भी अभियोजन के मामले की एक महत्वपूर्ण कमी माना।

    इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार किया और आरोपी को बरी किए जाने का फैसला बरकरार रखा।

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