फीस वृद्धि और स्टाइपेंड विवाद आत्महत्या के लिए उकसावा नहीं: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने मेडिकल कॉलेज चेयरमैन को मिली राहत बरकरार रखी
Amir Ahmad
27 July 2026 5:23 PM IST

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल स्टूडेंट की आत्महत्या से जुड़े मामले में मेडिकल कॉलेज के चेयरमैन और एनेस्थीसिया विभाग के प्रमुख को आरोपमुक्त किए जाने के ट्रायल कोर्ट का आदेश बरकरार रखा।
अदालत ने कहा कि फीस वृद्धि, अवकाश से इनकार स्टाइपेंड में कटौती और अन्य प्रशासनिक विवाद जब तक उनमें आत्महत्या के लिए प्रत्यक्ष उकसावे या आपराधिक मंशा का स्पष्ट प्रमाण न हो तब तक उन्हें आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण का अपराध नहीं माना जा सकता।
जस्टिस जय कुमार पिल्लई की पीठ ने राज्य सरकार की पुनर्विचार याचिका खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया।
अदालत ने कहा,
"रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री के सावधानीपूर्वक परीक्षण से स्पष्ट है कि आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण का मामला नहीं बनता। अभियोजन के आरोप अधिकतर प्रशासनिक और नागरिक प्रकृति के विवाद हैं, जिनमें भारतीय दंड संहिता की धारा 306 के तहत आवश्यक प्रत्यक्ष आपराधिक मंशा का अभाव है।"
मामला इंदौर स्थित इंडेक्स मेडिकल कॉलेज की डॉक्टर ऑफ मेडिसिन की छात्रा की आत्महत्या से जुड़ा है। छात्रा के भाई को उसकी सहपाठी के फोन से घटना की जानकारी मिली थी। इसके बाद 7 जुलाई 2018 को प्राथमिकी दर्ज की गई और जांच के दौरान कॉलेज के चेयरमैन सुरेश भदौरिया तथा एनेस्थीसिया विभाग के प्रमुख डॉ. के. के. खान को आरोपी बनाया गया।
जांच में एक कथित सुसाइड नोट भी मिला जिसमें छात्रा ने आरोप लगाया था कि कॉलेज प्रबंधन ने मनमाने ढंग से अधिक फीस की मांग की उसके साथ दुर्व्यवहार किया और लगातार प्रताड़ित किया जिसके कारण उसने यह कदम उठाया।
हालांकि ट्रायल कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद दोनों आरोपियों को आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण के आरोप से मुक्त कर दिया। राज्य सरकार ने इसी आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
राज्य की ओर से कहा गया कि निर्धारित 8.55 लाख रुपये की फीस के अतिरिक्त 4 लाख रुपये की अवैध मांग कर छात्रा को लगातार प्रताड़ित किया गया। यह भी बताया गया कि अतिरिक्त फीस की मांग के खिलाफ पहले से एक रिट याचिका हाईकोर्ट की जबलपुर पीठ में लंबित है।
वहीं आरोपियों की ओर से कहा गया कि फीस, अवकाश और शैक्षणिक प्रशासन से जुड़े विवादों को आत्महत्या का प्रत्यक्ष कारण नहीं माना जा सकता। मामले में आत्महत्या के लिए उकसाने की आवश्यक आपराधिक मंशा का कोई प्रमाण नहीं है।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के स्थापित सिद्धांतों का हवाला देते हुए कहा कि आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण का अपराध तभी बनता है, जब आरोपी का आचरण आत्महत्या का प्रत्यक्ष और निकट कारण साबित हो।
अदालत ने सुसाइड नोट का भी परीक्षण किया और पाया कि उसमें केवल आरोपियों का ही नहीं, बल्कि कई अन्य परिस्थितियों का भी उल्लेख है तथा वह कई लोगों को संबोधित था।
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की उस टिप्पणी से भी सहमति जताई, जिसमें कहा गया कि स्टूडेंट्स अपने सहपाठी के साथ सहजीवन संबंध में थी। ट्रायल कोर्ट के अनुसार उम्र में चार वर्ष के अंतर के कारण सहपाठी द्वारा विवाह से इनकार किए जाने से छात्रा गहरे अवसाद में चली गई थी और दोनों के बीच अक्सर विवाद होते थे।
अदालत ने यह भी नोट किया कि सुसाइड नोट छात्रा के पास से नहीं, बल्कि उसी सहपाठी के पास से बरामद हुआ था। एक गवाह ने यह भी बयान दिया था कि उसने सहपाठी को जल्दबाजी में एक कागज अपनी दराज में छिपाते हुए देखा था।
हाईकोर्ट ने अभियोजन की जांच में भी कई गंभीर कमियां पाईं। अदालत ने कहा कि गवाहों के बयान तैयार करने में एक जैसी भाषा का इस्तेमाल किया गया जिससे जांच की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं।
फीस वृद्धि को लेकर लंबित याचिका का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा कि उस मामले में हाईकोर्ट पहले ही छात्रा और 29 अन्य विद्यार्थियों को अंतरिम राहत दे चुका था।
इन सभी तथ्यों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि फीस वृद्धि, विभागाध्यक्ष द्वारा अवकाश से इनकार, अनुपस्थिति पर स्टाइपेंड में कटौती या रिट याचिका दायर करने को लेकर कथित उत्पीड़न को कानून की दृष्टि से आत्महत्या के लिए उकसाने वाला कारण नहीं माना जा सकता।
इन्हीं आधारों पर हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आरोपमुक्त करने के आदेश को पूरी तरह वैध मानते हुए राज्य सरकार की पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी।


