धर्म परिवर्तन के कथित प्रचार में उपकरण उपलब्ध कराने वालों पर कार्रवाई जारी रहेगी, FIR रद्द करने से एमपी हाईकोर्ट का इनकार

Amir Ahmad

4 July 2026 3:14 PM IST

  • धर्म परिवर्तन के कथित प्रचार में उपकरण उपलब्ध कराने वालों पर कार्रवाई जारी रहेगी, FIR रद्द करने से एमपी हाईकोर्ट का इनकार

    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने धर्म परिवर्तन के कथित प्रलोभन के प्रचार-प्रसार में इस्तेमाल किए गए उपकरण उपलब्ध कराने के आरोप में तीन लोगों के खिलाफ दर्ज FIR रद्द करने से इनकार किया।

    अदालत ने कहा कि जांच के दौरान एकत्र सामग्री प्रथम दृष्टया आरोपियों की संलिप्तता दर्शाती है, इसलिए उनके खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद हैं।

    जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की खंडपीठ ने कहा कि आरोप तय करने के चरण में अदालत का काम केवल यह देखना होता है कि प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं। इस स्तर पर साक्ष्यों का विस्तृत मूल्यांकन कर मुकदमे जैसा परीक्षण नहीं किया जा सकता।

    अदालत ने कहा,

    "जांच के दौरान एकत्र सामग्री प्रथम दृष्टया यह दर्शाती है कि पुनरीक्षण याचिकाकर्ताओं ने कथित धर्म परिवर्तन के प्रलोभन के प्रचार में इस्तेमाल किए गए उपकरण उपलब्ध कराए। आरोप तय करने के चरण में केवल यह देखा जाता है कि प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं।"

    मामले के अनुसार, 20 जून 2025 को गजराज सिंह ने लिखित शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में कहा गया कि गांव में भग्गू जियाजी के घर आयोजित एक बैठक में कुछ लोग ग्रामीणों को ईसाई धर्म अपनाने के लिए कथित रूप से प्रलोभन दे रहे थे।

    आरोप है कि ईसाई धर्म अपनाने वालों को मुफ्त इलाज, बेहतर शिक्षा और 50 हजार रुपये देने का आश्वासन दिया जा रहा था।

    इस शिकायत के आधार पर पांच लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया। जांच के दौरान पता चला कि दो आरोपी नाबालिग हैं।

    याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि शिकायत मध्य प्रदेश धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम की धारा 4 के अनुरूप नहीं थी, क्योंकि शिकायत दर्ज कराने का अधिकार केवल निर्धारित व्यक्तियों को है।

    हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता स्वयं उस बैठक में मौजूद था, जहां कथित रूप से धर्म परिवर्तन के लिए प्रलोभन दिया गया। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि शिकायत कानून के अनुरूप नहीं थी।

    अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आरोप तय करने या आरोपी को आरोपमुक्त करने के चरण में अदालत केवल रिकॉर्ड और जांच के दौरान उपलब्ध कराए गए दस्तावेजों पर विचार करती है। यदि प्रथम दृष्टया पर्याप्त सामग्री मौजूद हो तो मुकदमा आगे बढ़ना चाहिए।

    खंडपीठ ने राजस्थान राज्य बनाम अशोक कुमार कश्यप तथा सीबीआई बनाम आर्यन सिंह मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि इस चरण पर अदालत मिनी ट्रायल नहीं कर सकती और न ही साक्ष्यों का विस्तृत परीक्षण कर सकती है।

    रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि उपलब्ध सामग्री प्रथम दृष्टया अधिनियम की धारा 2(क) के तहत "प्रलोभन" की परिभाषा के दायरे में आती है। साथ ही आरोपियों द्वारा कथित प्रचार के लिए उपकरण उपलब्ध कराने की भूमिका भी प्रथम दृष्टया सामने आती है।

    इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने पुनरीक्षण याचिका खारिज करते हुए निचली अदालत द्वारा आरोप तय करने का आदेश बरकरार रखा।

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