इंदौर जल प्रदूषण मामला: हाइकोर्ट ने गठित किया रिटायर जज की अध्यक्षता में जांच आयोग

Amir Ahmad

28 Jan 2026 12:34 PM IST

  • इंदौर जल प्रदूषण मामला: हाइकोर्ट ने गठित किया रिटायर जज की अध्यक्षता में जांच आयोग

    इंदौर में हाल ही में सामने आए गंभीर जल संकट और दूषित पेयजल आपूर्ति के मामले में मध्य प्रदेश हाइकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्वतंत्र जांच के आदेश दिए। हाइकोर्ट ने भागीरथपुरा क्षेत्र में जल प्रदूषण और उसके इंदौर शहर के अन्य इलाकों पर पड़े प्रभाव की जांच के लिए रिटायर जज जस्टिस सुशील कुमार गुप्ता की अध्यक्षता में एक सदस्यीय न्यायिक आयोग का गठन किया।

    जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की खंडपीठ ने कहा कि लगाए गए आरोप अत्यंत गंभीर हैं। यह मामला संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार से सीधे जुड़ा है। कोर्ट ने कहा कि तथ्यों की निष्पक्ष जांच के लिए एक स्वतंत्र और विश्वसनीय प्राधिकरण द्वारा जांच आवश्यक है। इसी को ध्यान में रखते हुए रिटायर जज जस्टिस सुशील कुमार गुप्ता को जांच आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया गया।

    पिछली सुनवाई के दौरान हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सबसे पहले नागरिकों को स्वच्छ पेयजल और मेडिकल सुविधाएं उपलब्ध कराना प्राथमिकता है। इसी कारण उस समय स्वतंत्र जांच की मांग पर विचार स्थगित किया गया। इससे पहले कोर्ट ने राज्य सरकार और इंदौर नगर निगम को आपात कदम उठाने और मानव उपभोग योग्य स्वच्छ पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। हाइकोर्ट ने यह भी दोहराया कि अनुच्छेद 21 के अंतर्गत स्वच्छ और सुरक्षित पेयजल का अधिकार भी शामिल है।

    हाइकोर्ट के समक्ष राज्य सरकार और इंदौर नगर निगम ने पिछली सुनवाई के अनुपालन में अंतरिम रिपोर्ट दाखिल की थी और बताया कि जल प्रदूषण के कारणों की जांच के लिए एक उच्च स्तरीय समिति गठित की गई। हालांकि याचिकाकर्ताओं के वकील ने इन रिपोर्टों को चुनौती देते हुए कहा कि जमीनी हकीकत में अब भी सुरक्षित पेयजल की आपूर्ति नहीं हो रही है। उन्होंने मीडिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए दावा किया कि दूषित पानी के कारण अब तक लगभग 30 लोगों की मौत हो चुकी है।

    हालिया सुनवाई में राज्य सरकार ने मृत्यु ऑडिट और विश्लेषणात्मक रिपोर्ट पेश की, जिसमें बताया गया कि 23 मौतें हुईं, जिनमें से 16 मौतें जल प्रदूषण के कारण बताई गईं, जबकि अन्य मामलों को संभावित महामारी से जुड़ा या अस्पष्ट बताया गया। याचिकाकर्ताओं के वकील ने कोर्ट का ध्यान इस ओर दिलाया कि यह रिपोर्ट जानकारी, केस शीट और तथाकथित 'मौखिक पोस्टमार्टम' पर आधारित है। कोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि राज्य सरकार 'मौखिक पोस्टमार्टम' की स्पष्ट परिभाषा या प्रक्रिया बताने में असमर्थ रही।

    हाइकोर्ट ने कहा कि भागीरथपुरा क्षेत्र में पेयजल आपूर्ति के दूषित होने का मामला अत्यंत गंभीर है, जिससे बच्चों और बुजुर्गों सहित बड़ी आबादी के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। कोर्ट ने यह भी कहा कि जहां एक ओर याचिकाकर्ता और मीडिया रिपोर्टें मृतकों की संख्या लगभग 30 बता रही हैं, वहीं सरकारी रिपोर्ट में केवल 16 मौतें दर्शाई गई हैं, वह भी बिना ठोस आधार और रिकॉर्ड के।

    कोर्ट ने टिप्पणी की कि नागरिक निकायों की ओर से पेयजल मानकों को बनाए रखने में विफलता के कारण जलजनित बीमारियां फैली हैं। कोर्ट ने कहा कि प्रस्तुत की गई तस्वीरें, मेडिकल रिपोर्ट और अधिकारियों को दी गई शिकायतें प्रथम दृष्टया इस बात का संकेत देती हैं कि यह मामला तत्काल न्यायिक जांच की मांग करता है।

    इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए हाइकोर्ट ने एक स्वतंत्र और विश्वसनीय जांच को आवश्यक मानते हुए रिटायर जज जस्टिस सुशील कुमार गुप्ता की अध्यक्षता में एक सदस्यीय जांच आयोग का गठन किया। कोर्ट ने आयोग के कार्यक्षेत्र, संदर्भ बिंदुओं, सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े पहलुओं और जांच की शक्तियों को लेकर विस्तृत दिशा-निर्देश भी जारी किए।

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