अनुकंपा नियुक्ति में बेटी का दावा पोते से स्वतः श्रेष्ठ नहीं माना जा सकता: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कर्मचारी की सेवा बहाल की

  • अनुकंपा नियुक्ति में बेटी का दावा पोते से स्वतः श्रेष्ठ नहीं माना जा सकता: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कर्मचारी की सेवा बहाल की

    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि मृत सरकारी कर्मचारी की बेटी का अनुकंपा नियुक्ति का दावा केवल बेटी होने के आधार पर उसके पोते के दावे से स्वतः श्रेष्ठ नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि अनुकंपा नियुक्ति का फैसला संबंधित राज्य सरकार की लागू नीति और मामले के तथ्यों के आधार पर किया जाना चाहिए।

    जस्टिस आनंद सिंह बहारावत ने कहा,

    “केवल इसलिए कि हस्तक्षेपकर्ता मृत कर्मचारी की बेटी है, उसके दावे को याचिकाकर्ता यानी पोते के दावे से स्वतः श्रेष्ठ नहीं माना जा सकता। अनुकंपा नियुक्ति के प्रश्न पर लागू नीति और सक्षम प्राधिकारी के समक्ष प्रस्तुत तथ्यों के अनुसार विचार किया जाना आवश्यक है।”

    मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता के दादा-दादी में से उसकी दादी भिंड जिले के एक सरकारी आयुर्वेदिक औषधालय में दाई के पद पर सरकारी कर्मचारी थीं। याचिकाकर्ता के पिता की मृत्यु वर्ष 2008 में हो गई थी, उस समय उसकी उम्र महज 12 वर्ष थी। इसके बाद याचिकाकर्ता, उसकी विधवा मां, दो बहनें और छोटा भाई आजीविका के लिए अपनी दादी पर निर्भर थे।

    याचिकाकर्ता के अनुसार, उसकी दादी की मृत्यु दिसंबर 2015 में हुई। परिवार का आश्रित सदस्य होने के आधार पर उसने जून 2016 में अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया। उसका दावा था कि वह पद के लिए आवश्यक सभी शैक्षणिक योग्यताएं पूरी करता था। स्क्रीनिंग कमेटी ने उसके आवेदन पर विचार किया और इसके बाद 29 अगस्त 2016 के आदेश से उसे दवसाज के पद पर तीन साल की परिवीक्षा अवधि के लिए नियुक्त कर दिया गया।

    इसके बाद एक शिकायत दर्ज कराई गई, जिसमें आरोप लगाया गया कि याचिकाकर्ता सितंबर 2014 की नीति के खंड 2.1 से 2.7 के तहत आश्रित की परिभाषा में नहीं आता। इसके आधार पर उसे कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। याचिकाकर्ता के जवाब और बयान के बावजूद, संभागीय आयुष अधिकारी यानी प्रतिवादी नंबर 3 ने फरवरी 2019 में आदेश पारित कर उसकी नियुक्ति रद्द की।

    याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि उसे सुनवाई का अवसर दिए बिना नियुक्ति समाप्त कर दी गई। उन्होंने कहा कि चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की नियुक्ति रद्द करना सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1966 के तहत एक बड़ा दंड है।

    वकील ने आगे कहा कि संबंधित नीति के खंड 2.5 और 2.7 के अनुसार, पति-पत्नी दोनों की मृत्यु होने की स्थिति में गोद लिया गया बेटा या नामित पारिवारिक सदस्य नियुक्ति के लिए पात्र हो सकता है। याचिकाकर्ता का नाम उसकी दादी के सेवा अभिलेखों में नामित सदस्य के रूप में दर्ज था। इसलिए उसकी नियुक्ति वैध थी और इसमें किसी प्रकार का गलत तथ्य प्रस्तुत नहीं किया गया।

    राज्य की ओर से दलील दी गई कि नियुक्ति रद्द करने का आदेश उचित था, क्योंकि याचिकाकर्ता नीति के खंड 2.1 से 2.7 के तहत पात्र आश्रितों की श्रेणी में नहीं आता। राज्य ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति नीति का उद्देश्य मृत सरकारी कर्मचारी के आश्रितों को आजीविका का साधन उपलब्ध कराना है। याचिकाकर्ता विधवा बेटी का बेटा है, इसलिए उसे पात्र आश्रित नहीं माना जा सकता।

    हाईकोर्ट ने कहा कि विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या सक्षम प्राधिकारी द्वारा याचिकाकर्ता के मामले पर विचार करने और नियुक्ति देने के बाद कई वर्षों तक सेवा में रहने के बावजूद उसकी नियुक्ति रद्द करना उचित है।

    अदालत ने स्पष्ट किया कि अनुकंपा नियुक्ति सामान्य भर्ती नियम का अपवाद है और कोई व्यक्ति लागू नीति के विपरीत इसका दावा नहीं कर सकता। हालांकि, खंडपीठ ने कहा कि मौजूदा मामले का फैसला उसके विशिष्ट तथ्यों और गुण-दोष के आधार पर किया जाना चाहिए।

    अदालत ने गौर किया कि याचिकाकर्ता को नियुक्त करने से पहले उसके मामले पर सक्षम अधिकारियों ने विचार किया और स्क्रीनिंग कमेटी ने उसकी पारिवारिक परिस्थितियों का मूल्यांकन किया था। इस तरह उसकी नियुक्ति पर सोच-समझकर निर्णय लिया गया।

    हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि नियुक्ति रद्द करने वाले आदेश में ऐसा कोई निष्कर्ष नहीं था कि याचिकाकर्ता ने महत्वपूर्ण तथ्य छिपाकर या धोखाधड़ी करके नियुक्ति प्राप्त की थी।

    इस संदर्भ में अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले मोहम्मद जमील अहमद बनाम बिहार राज्य का उल्लेख किया, जिसमें पुलिस कांस्टेबल की अनुकंपा नियुक्ति के लगभग 15 वर्ष बाद सरकार ने उसकी सेवा समाप्त कर दी थी।

    इन पहलुओं पर विचार करते हुए खंडपीठ ने कहा,

    “प्रतिवादी, याचिकाकर्ता के मामले पर विचार करने और उसे अनुकंपा नियुक्ति देने के बाद कई वर्षों के पश्चात उन्हीं तथ्यों के आधार पर उसकी नियुक्ति रद्द नहीं कर सकते, जो नियुक्ति के समय उनके संज्ञान में थे। यह विशेष रूप से तब महत्वपूर्ण है, जब याचिकाकर्ता के खिलाफ धोखाधड़ी या जानबूझकर तथ्य छिपाने का कोई निष्कर्ष नहीं है।”

    अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि नियुक्ति रद्द करने के आदेश को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता हाईकोर्ट पहुंचा था और अदालत ने उस आदेश के क्रियान्वयन पर रोक लगाई थी। इसके परिणामस्वरूप वह मार्च 2019 से अब तक अवकाश पर रहा। अदालत के अनुसार, नियुक्ति के बाद से उसकी सेवा अवधि लगभग 10 वर्ष हो चुकी थी।

    आश्रित होने के सवाल पर हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता के दावे को इस तथ्य से समर्थन मिलता है कि स्क्रीनिंग कमेटी ने उसके मामले पर विचार करने के बाद ही नियुक्ति की सिफारिश की थी। दूसरी ओर, हस्तक्षेपकर्ता बेटी यह साबित नहीं कर सकी कि वह अपनी मां पर आर्थिक रूप से निर्भर थी या मृत कर्मचारी के परिवार का भरण-पोषण कर रही थी।

    परिवार के सदस्यों के बीच नियुक्ति को लेकर विवाद पर अदालत ने 29 सितंबर 2014 की नीति का उल्लेख किया। इस नीति में प्रावधान है कि यदि परिवार के सदस्य अनुकंपा नियुक्ति के लिए एक-दूसरे की सहमति नहीं देते हैं, तो सक्षम प्राधिकारी को यह तय करना होगा कि परिवार के किस सदस्य को नियुक्ति दी जानी चाहिए।

    पीठ ने कहा कि नीति स्वयं यह स्वीकार करती है कि परिवार के सदस्यों के बीच मतभेद या विवाद हो सकते हैं। ऐसे मामलों में सक्षम प्राधिकारी को सभी दावों पर विचार कर निर्णय लेने की व्यवस्था दी गई।

    हाईकोर्ट ने दोहराया कि अनुकंपा नियुक्ति के मामले में लागू नीति और सक्षम प्राधिकारी के समक्ष रखे गए तथ्यों के आधार पर निर्णय लिया जाना चाहिए। मौजूदा मामले की परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने कहा कि इस स्तर पर याचिकाकर्ता को उसकी नौकरी से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।

    इसी आधार पर हाईकोर्ट ने नियुक्ति रद्द करने का आदेश निरस्त कर दिया और प्रतिवादियों को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को दवसाज के पद पर सेवा जारी रखने की अनुमति दी जाए।

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