COVID-19 के दौरान खत्म हुई भवन अनुमति पर राहत, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट बोला- वित्तीय हित किसी व्यक्ति के जीवन से ऊपर नहीं हो सकते
Amir Ahmad
15 July 2026 12:49 PM IST

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने COVID-19 महामारी के दौरान समाप्त हुई भवन निर्माण अनुमति के मामले में अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी व्यक्ति के जीवन से बढ़कर वित्तीय हित नहीं हो सकते। कोर्ट ने नगर निगम द्वारा आवेदक पर नई भवन अनुमति लेने और इसके लिए दोबारा शुल्क जमा करने का दबाव बनाने के रवैये पर कड़ी टिप्पणी की।
जस्टिस जी. एस. अहलूवालिया और जस्टिस अनुराधा शुक्ला की खंडपीठ ने नगर निगम की अपील खारिज करते हुए सिंगल बेंच का आदेश बरकरार रखा, जिसमें निगम को भूमि विकास नियम, 2012 के नियम 23(3) के तहत भवन अनुमति के विस्तार के आवेदन पर दोबारा विचार करने का निर्देश दिया गया।
खंडपीठ ने कहा कि COVID-19 महामारी के दौरान केंद्र सरकार और जिला प्रशासन की ओर से लगाए गए प्रतिबंधों के कारण निर्माण कार्य शुरू करना संभव नहीं था। ऐसे में केवल नया शुल्क वसूलने के उद्देश्य से आवेदक को नई भवन अनुमति लेने के लिए मजबूर करना उचित नहीं कहा जा सकता।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा,
"जब COVID-19 महामारी के कारण केंद्र सरकार और जिला प्रशासन की ओर से प्रतिबंध लागू थे तथा लोगों का जीवन खतरे में था, तब केवल नया शुल्क वसूलने के लिए उत्तरदाता पर नई भवन अनुमति लेने का दबाव बनाना सराहनीय नहीं है। वित्तीय प्रभाव किसी व्यक्ति के जीवन से ऊपर नहीं हो सकते।"
मामले में नगर निगम ने दलील दी कि आवेदक को भवन निर्माण की अनुमति दी गई थी, लेकिन निर्धारित तीन वर्षों में निर्माण शुरू नहीं होने पर उसे एक बार विस्तार दिया गया। इसके बाद भी निर्माण कार्य शुरू नहीं हुआ तो एक वर्ष का अतिरिक्त समय दिया गया। इस तरह भवन अनुमति की अधिकतम वैधता पांच वर्ष पूरी होने पर 9 जून, 2020 को अनुमति स्वतः समाप्त हो गई। बाद में विस्तार का आवेदन 6 अगस्त, 2021 को खारिज कर दिया गया।
इसके बाद आवेदक ने हाईकोर्ट की सिंगल बेंच का रुख किया। सिंगल बेंच ने नगर निगम को निर्देश दिया कि वह नियम 23(3) के तहत आवेदन पर नए सिरे से विचार करे और COVID-19 के दौरान लागू प्रतिबंधों के प्रभाव को भी ध्यान में रखे।
हालांकि, पुनर्विचार के दौरान नगर निगम ने यह कहते हुए आवेदन फिर खारिज किया कि निर्माण कार्य शुरू ही नहीं हुआ, इसलिए नियम 23(2) का लाभ नहीं दिया जा सकता। इस आदेश को भी एकल पीठ ने निरस्त कर दिया।
अपील की सुनवाई के दौरान नगर निगम ने कहा कि वह नगर निगम अधिनियम की धारा 200 के तहत आवेदन पर विचार करने को तैयार है। वहीं, आवेदक की ओर से कहा गया कि COVID-19 के दौरान लगे प्रतिबंधों के कारण निर्माण कार्य शुरू करना असंभव था और इसी वजह से भवन अनुमति की अवधि समाप्त हो गई।
खंडपीठ ने कहा कि जब भवन अनुमति 9 जून, 2020 को समाप्त हुई, उस समय COVID-19 से जुड़े प्रतिबंध प्रभावी थे। एकल पीठ ने इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए आवेदन पर नियम 23(3) के तहत विचार करने का निर्देश दिया।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि नगर निगम को सिंगल बेंच के उस निर्देश से आपत्ति थी तो उसे उसी समय उसके खिलाफ अपील करनी चाहिए। पुनर्विचार के दौरान वही तर्क दोहराकर वह सिंगल बेंच के आदेश को दरकिनार नहीं कर सकता।
हाईकोर्ट ने यह भी माना कि विवाद का मूल कारण यह था कि नई भवन अनुमति लेने की स्थिति में आवेदक को दोबारा शुल्क जमा करना पड़ता। अंततः कोर्ट ने सिंगल बेंच के आदेश को सही ठहराते हुए नगर निगम की अपील खारिज की।


