नाबालिग लड़की की उम्र छिपाने के आरोप पर पुलिस अधिकारी और स्कूल प्राचार्य के खिलाफ कार्रवाई पर फैसला लें: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने DGP को दिए निर्देश

Amir Ahmad

10 July 2026 5:23 PM IST

  • नाबालिग लड़की की उम्र छिपाने के आरोप पर पुलिस अधिकारी और स्कूल प्राचार्य के खिलाफ कार्रवाई पर फैसला लें: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने DGP को दिए निर्देश

    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने पुलिस महानिदेशक (DGP) को निर्देश दिया कि वह एक पुलिस अधिकारी और एक स्कूल प्राचार्य के खिलाफ कार्रवाई की आवश्यकता पर एक महीने के भीतर निर्णय लें। अदालत ने प्रथम दृष्टया पाया कि दोनों ने नाबालिग लड़की की वास्तविक जन्मतिथि से जुड़े महत्वपूर्ण दस्तावेज दबाकर उसकी उम्र को लेकर संदेह पैदा किया जिससे आरोपी को आपराधिक मामले में बरी होने में मदद मिली।

    जस्टिस जी.एस. अहलूवालिया और जस्टिस अनुराधा शुक्ला की खंडपीठ ने कहा कि उपलब्ध सभी आधिकारिक अभिलेखों में लड़की की जन्मतिथि 10 फरवरी 2009 दर्ज है, लेकिन जांच अधिकारी और स्कूल के प्राचार्य ने महत्वपूर्ण दस्तावेजों को सामने नहीं लाया, जिससे अदालत के समक्ष उसकी उम्र को लेकर भ्रम की स्थिति बनी।

    खंडपीठ ने कहा,

    "सभी दस्तावेजों में लड़की की जन्मतिथि 10 फरवरी 2009 दर्ज है, लेकिन अभियोजन ने जानबूझकर ऐसी स्थिति पैदा कर दी कि अदालत को यह कहना पड़ा कि अपराध की तिथि पर लड़की के नाबालिग होने को संदेह से परे साबित नहीं किया जा सका।"

    मामला बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ता लड़की को अपने साथ ले गया था, जिसके बाद उसके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज हुआ। बाद में वह दोबारा लड़की के साथ चला गया। लड़की को अदालत के समक्ष पेश किए जाने पर उसने अपने माता-पिता के साथ जाने से इनकार कर दिया। चूंकि वह नाबालिग थी, इसलिए उसे गुना स्थित वन स्टॉप सेंटर में रखा गया।

    इस बीच ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को यह कहते हुए बरी कर दिया कि अभियोजन यह साबित नहीं कर सका कि घटना के समय लड़की नाबालिग थी। यह निष्कर्ष स्कूल के प्राचार्य द्वारा जारी प्रमाणपत्र के आधार पर निकाला गया।

    हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान लड़की ने याचिकाकर्ता के साथ रहने की इच्छा जताई, जबकि उसके माता-पिता ने स्पष्ट कहा कि उसकी जन्मतिथि 10 फरवरी 2009 है। अदालत के समक्ष लाड़ली लक्ष्मी योजना, योजना, अर्थशास्त्र एवं सांख्यिकी विभाग तथा नगर परिषद के दस्तावेज भी प्रस्तुत किए गए, जिनमें यही जन्मतिथि दर्ज है।

    माता ने अदालत को बताया कि उसने ये दस्तावेज पुलिस को दिए, लेकिन जांच अधिकारी ने उन्हें आरोपपत्र के साथ पेश नहीं किया। इसके बाद हाईकोर्ट ने केस डायरी और स्कूल का मूल प्रवेश रजिस्टर तलब किया। राज्य के वकील को स्कूल का रजिस्टर जब्त करने का भी निर्देश दिया गया, जिसका पालन किया गया।

    रिकॉर्ड की जांच में अदालत ने पाया कि स्कूल के संशोधित एडमिशन रजिस्टर में वर्ष 2015 में आधार कार्ड और जन्म प्रमाणपत्र के आधार पर लड़की की जन्मतिथि 10 फरवरी 2009 दर्ज की गई थी। इसके बावजूद प्राचार्य ने अदालत को जो प्रमाणपत्र दिया, उसमें संशोधित प्रविष्टि का उल्लेख नहीं किया गया।

    अदालत ने यह भी पाया कि जांच अधिकारी ने लड़की के माता-पिता से शैक्षणिक दस्तावेज जुटाने का कोई प्रयास नहीं किया।

    हाईकोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि जांच अधिकारी और स्कूल प्राचार्य ने महत्वपूर्ण दस्तावेज छिपाकर अदालत के समक्ष ऐसी स्थिति बनाई, जिससे आरोपी को लाभ मिल सके।

    हालांकि, अदालत ने इस पहलू पर विस्तृत टिप्पणी करने से परहेज किया, क्योंकि आरोपी की बरी होने के खिलाफ राज्य सरकार की अपील हाईकोर्ट की इंदौर पीठ में लंबित है।

    अदालत ने माना कि उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार लड़की अभी भी नाबालिग है। इसलिए उसे बालिग होने तक गुना के वन स्टॉप सेंटर में ही रखा जाएगा।

    हाईकोर्ट ने DGP को निर्देश दिया कि वह पुलिस अधिकारी और संबंधित स्कूल प्राचार्य के खिलाफ कार्रवाई की आवश्यकता पर एक महीने के भीतर निर्णय लें और 12 अगस्त 2026 तक अपनी रिपोर्ट प्रधान रजिस्ट्रार (जनरल) के समक्ष प्रस्तुत करें। इसके साथ ही याचिका का निस्तारण कर दिया गया।

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