ट्रायल के देर के चरण में बिना प्रासंगिकता व प्रमाण के पेन-ड्राइव साक्ष्य स्वीकार नहीं किए जा सकते: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
Amir Ahmad
11 Feb 2026 4:06 PM IST

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी आपराधिक मुकदमे में ट्रायल के देर के चरण में पेश किए जाने वाले इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य तभी स्वीकार किए जा सकते हैं, जब उनकी आरोपों से स्पष्ट प्रासंगिकता हो और उन्हें विधि के अनुसार सिद्ध किया जा सके।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने एक फर्जीवाड़ा मामले में मृतक मरीज की कथित आवाज़ रिकॉर्डिंग वाली पेन-ड्राइव को रिकॉर्ड पर लेने से इनकार कर दिया।
जस्टिस बी.पी. शर्मा ने यह फैसला मालिनी जैन द्वारा दायर याचिका पर सुनाया, जिसमें उन्होंने छिंदवाड़ा के प्रथम अपर सेशन जज द्वारा पारित उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके माध्यम से साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-बी के तहत पेन-ड्राइव को रिकॉर्ड पर लेने की उनकी अर्जी खारिज कर दी गई थी।
मामले में आरोप था कि प्रतिवादी नंबर-1 ने याचिकाकर्ता के पति के इलाज से संबंधित मेडिकल दस्तावेज़ों में जालसाज़ी की थी, जिनकी उपचार के दौरान मृत्यु हो गई। इस संबंध में 13 अक्टूबर 2021 को IPC की धारा 420, 467, 468 और 471 के तहत FIR दर्ज की गई।
याचिकाकर्ता का कहना था कि मृत्यु से पहले उनके पति ने फोन पर परिवार के सदस्यों को बताया कि उन्हें समुचित मेडिकल ट्रीटमेंट नहीं मिल रहा है और ये बातचीत पेन-ड्राइव में रिकॉर्ड है।
उनके अनुसार यह रिकॉर्डिंग यह साबित करने में महत्वपूर्ण है कि आरोपी ने अपनी मेडिकल लापरवाही को छिपाने के लिए मेडिकल रिकॉर्ड गढ़े। यह भी तर्क दिया गया कि ट्रायल कोर्ट ने इस साक्ष्य की प्रासंगिकता पर विचार किए बिना यांत्रिक ढंग से अर्जी खारिज की।
वहीं, प्रतिवादियों ने इस दलील का विरोध करते हुए कहा कि जांच के दौरान धारा 161 CrPC के तहत दर्ज किसी भी पारिवारिक सदस्य के बयान में इस तरह की फोन बातचीत का कोई ज़िक्र नहीं है।
उन्होंने यह भी इंगित किया कि घटना के तीन वर्ष से अधिक समय बाद यह आवेदन दायर किया गया, जिससे पेन-ड्राइव और उसकी सामग्री की विश्वसनीयता पर गंभीर संदेह उत्पन्न होता है।
ट्रायल कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई स्वीकार्य साक्ष्य मौजूद नहीं है, जिससे यह प्रमाणित हो सके कि रिकॉर्डिंग में सुनाई देने वाली आवाज़ वास्तव में मृतक की ही है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि पेन-ड्राइव को स्वीकार भी कर लिया जाए तो मृतक की आवाज़ की पहचान से संबंधित किसी निश्चित और स्वीकृत साक्ष्य के अभाव में अभियोजन उस बातचीत को सिद्ध नहीं कर पाएगा।
कोर्ट ने आगे यह भी महत्वपूर्ण माना कि कथित बातचीत का विषय मेडिकल लापरवाही से संबंधित है, जबकि अभियुक्तों के विरुद्ध केवल मेडिकल दस्तावेज़ों की जालसाज़ी के आरोप तय किए गए और मेडिकल लापरवाही का कोई आरोप नहीं है।
ऐसे में यह सामग्री मामले के निर्णायक मुद्दों से संबंधित नहीं है और न्यायिक परीक्षण में सहायक नहीं हो सकती।
इसके अतिरिक्त हाईकोर्ट ने इस तथ्य को भी रेखांकित किया कि वर्ष 2021 की घटना के संबंध में पेन-ड्राइव को तीन वर्ष तीन महीने बाद प्रस्तुत किया गया और जांच के दौरान इसका कभी उल्लेख नहीं किया गया। इन परिस्थितियों में कोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट के आदेश में कोई कानूनी त्रुटि या अनियमितता नहीं है।
इन सभी कारणों से याचिका निराधार मानते हुए खारिज की गई।

