मूल विभाग में वापसी के बाद कर्मचारी पर कार्रवाई का अधिकार उधार लेने वाले विभाग को नहीं, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने आरोपपत्र रद्द किया

  • मूल विभाग में वापसी के बाद कर्मचारी पर कार्रवाई का अधिकार उधार लेने वाले विभाग को नहीं, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने आरोपपत्र रद्द किया

    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि प्रतिनियुक्ति पर गए किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ उधार लेने वाला विभाग तभी तक अनुशासनात्मक कार्रवाई कर सकता है, जब तक उस विभाग और कर्मचारी के बीच नियोक्ता-कर्मचारी का संबंध कायम रहता है। कर्मचारी के अपने मूल विभाग में वापस भेजे जाने के बाद उधार लेने वाला विभाग उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई नहीं कर सकता।

    जस्टिस आनंद सिंह बहारवत की पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए कर्मचारी के खिलाफ जारी आरोपपत्र और विभागीय जांच के लिए जांच अधिकारी नियुक्त करने का आदेश रद्द किया। कोर्ट ने कहा कि एक बार नियोक्ता और कर्मचारी के बीच का संबंध समाप्त हो जाने के बाद उधार लेने वाले विभाग के पास संबंधित कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई करने का अधिकार नहीं रहता।

    मामला विशेष सशस्त्र बल (STF) के एक प्लाटून कमांडर से जुड़ा है। याचिकाकर्ता की नियुक्ति 6 मई 2013 को हुई और वर्ष 2016 में उसका पद बदलकर उपनिरीक्षक कर दिया गया। इसके बाद 21 अगस्त 2019 के आदेश के जरिए उसे विशेष कार्य बल यानी एसटीएफ में प्रतिनियुक्ति पर भेजा गया।

    बाद में 13 फरवरी 2020 के आदेश के जरिए उसे एसटीएफ से वापस विशेष सशस्त्र बल यानी उसके मूल विभाग में भेज दिया गया।

    याचिकाकर्ता का कहना था कि उसके मूल विभाग में वापस लौटने के करीब पांच साल बाद STF ने उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू की। एसटीएफ ने आरोप लगाया कि उसने उसकी जांच में हस्तक्षेप किया। याचिकाकर्ता ने विभागीय जांच को विशेष सशस्त्र बल में स्थानांतरित करने का अनुरोध किया और कहा कि मूल विभाग में वापसी के बाद STF के पास उसके खिलाफ कार्रवाई करने का अधिकार नहीं है।

    याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि 2 मई 2025 को STF ने आरोपपत्र जारी किया। इसके बाद 1 जून 2026 के आदेश से जांच अधिकारी नियुक्त कर विभागीय जांच आगे बढ़ाने की प्रक्रिया शुरू की गई। याचिकाकर्ता ने दोनों आदेशों को अधिकार क्षेत्र से बाहर बताते हुए चुनौती दी।

    याचिकाकर्ता के वकील ने मध्य प्रदेश सिविल सेवा वर्गीकरण, नियंत्रण तथा अपील नियम, 1966 के नियम 20 का हवाला देते हुए कहा कि उधार लेने वाले विभाग को प्रतिनियुक्त कर्मचारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई का अधिकार तभी तक है, जब तक वह कर्मचारी उस विभाग में प्रतिनियुक्ति पर है। मूल विभाग में वापसी के बाद यह अधिकार समाप्त हो जाता है।

    दूसरी ओर, राज्य की ओर से कहा गया कि याचिकाकर्ता ने एसटीएफ में अपनी नियुक्ति को गलत तरीके से प्रतिनियुक्ति माना है। राज्य का कहना था कि STF कोई अलग विभाग या वैधानिक निकाय नहीं है, बल्कि पुलिस विभाग का ही हिस्सा है और पुलिस महानिदेशक तथा गृह विभाग के प्रशासनिक नियंत्रण में काम करता है।

    राज्य की ओर से यह भी दलील दी गई कि याचिकाकर्ता का विशेष सशस्त्र बल से STF में जाना उसी विभाग के भीतर आंतरिक तैनाती थी और इसे कानूनी अर्थ में प्रतिनियुक्ति नहीं माना जा सकता। राज्य ने आरोपों को गंभीर कदाचार से जुड़ा बताया और कहा कि याचिकाकर्ता को आरोपपत्र का जवाब देने, साक्ष्य पेश करने, गवाहों से जिरह करने तथा अपने कानूनी और तथ्यात्मक पक्ष रखने का पूरा अवसर मिलेगा।

    हाईकोर्ट ने 21 अगस्त 2019 के पुलिस महानिदेशक के उस आदेश की जांच की, जिसके जरिए याचिकाकर्ता को विशेष सशस्त्र बल से STF में प्रतिनियुक्ति पर भेजा गया। कोर्ट ने 13 फरवरी 2020 के उस आदेश को भी देखा, जिसके जरिए उसे STF से वापस विशेष सशस्त्र बल भेजा गया।

    खंडपीठ ने कहा कि मामले में मुख्य सवाल यह है कि मध्य प्रदेश सिविल सेवा नियम, 1966 के नियम 20 के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई की शक्ति केवल प्रतिनियुक्ति जारी रहने तक इस्तेमाल की जा सकती है या कर्मचारी के मूल विभाग में लौटने के बाद भी उसका इस्तेमाल किया जा सकता है।

    नियम 20 की जांच के बाद कोर्ट ने कहा कि उधार लेने वाले विभाग को प्रतिनियुक्त कर्मचारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की शक्ति तभी तक रहती है, जब तक दोनों के बीच नियोक्ता-कर्मचारी का संबंध कायम है।

    कोर्ट ने कहा कि नियम 20 उधार लेने वाले विभाग को प्रतिनियुक्ति पर आए सरकारी कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई की शक्ति देता है, लेकिन इस शक्ति का इस्तेमाल उसी अवधि में किया जा सकता है, जब तक नियोक्ता और कर्मचारी का संबंध बना हुआ है। कर्मचारी के मूल विभाग में वापस चले जाने के बाद उधार लेने वाले विभाग के पास उसके खिलाफ कार्रवाई करने का अधिकार नहीं रहता।

    हाईकोर्ट ने STF को अलग इकाई नहीं मानने की राज्य की दलील पर भी विचार किया। कोर्ट ने संबंधित सरकारी आदेश का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रतिनियुक्ति के उद्देश्य से ऐसी विशेष इकाइयों को अलग इकाई के तौर पर माना जाता है।

    कोर्ट ने कहा कि केवल इस वजह से कि आतंकवाद निरोधक दस्ता या STF पुलिस विभाग के समग्र प्रशासनिक नियंत्रण में काम करता है, यह नहीं कहा जा सकता कि ऐसी इकाइयों में प्रतिनियुक्ति नहीं हो सकती।

    इस आधार पर हाईकोर्ट ने माना कि कर्मचारी के विशेष सशस्त्र बल में वापस लौटने के बाद STF उसके खिलाफ आरोपपत्र जारी नहीं कर सकता।

    कोर्ट ने याचिकाकर्ता के खिलाफ 2 मई 2025 को जारी आरोपपत्र और 1 जून 2026 को जांच अधिकारी की नियुक्ति के आदेश को रद्द कर दिया। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार की।

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