मुस्लिम कानून के तहत वैवाहिक अधिकारों की बहाली की याचिका पत्नी की क्रूरता और दहेज उत्पीड़न की FIR रद्द करने का आधार नहीं: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

  • मुस्लिम कानून के तहत वैवाहिक अधिकारों की बहाली की याचिका पत्नी की क्रूरता और दहेज उत्पीड़न की FIR रद्द करने का आधार नहीं: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि मुस्लिम कानून के तहत पति की ओर से वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए दायर याचिका अपने आप में पत्नी द्वारा क्रूरता और दहेज उत्पीड़न के आरोप में दर्ज कराई गई FIR रद्द करने का आधार नहीं बन सकती।

    जस्टिस प्रमोद कुमार अग्रवाल की पीठ ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498ए और दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धाराओं 3 और 4 के तहत दर्ज FIR रद्द करने की मांग वाली पति की याचिका खारिज करते हुए कहा कि पति यह साबित करने में विफल रहा कि पत्नी ने उसके वैवाहिक अधिकारों की बहाली संबंधी मुकदमे के जवाब में बदले की भावना से FIR दर्ज कराई थी।

    हाईकोर्ट ने कहा,

    “केवल इस आधार पर कि पति ने मुस्लिम कानून के तहत वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए आवेदन दायर किया है, आपराधिक कार्यवाही रद्द नहीं की जा सकती। इस तरह का आवेदन दायर करना आपराधिक कार्यवाही रद्द करने का आधार नहीं है।”

    पति के वकील ने अदालत को बताया कि दंपति की शादी दिसंबर 2020 में हुई थी और वे साथ रहते थे। उनके एक बच्चा भी है। हालांकि, पत्नी की तंबाकू सेवन की आदत को लेकर दोनों के बीच विवाद शुरू हो गया। पति ने जब पत्नी से तंबाकू सेवन बंद करने को कहा तो वह नाराज होकर अपने मायके चली गई। इसके बाद पति ने मुस्लिम कानून के तहत वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए आवेदन दायर किया।

    वकील ने बताया कि फैमिली कोर्ट ने 10 मार्च 2026 के फैसले में पत्नी को पति के साथ रहने का निर्देश दिया। इसके बावजूद पत्नी वापस नहीं लौटी। पति का तर्क था कि उसके खिलाफ दर्ज FIR वैवाहिक अधिकारों की बहाली की कार्यवाही का जवाब है और आपराधिक मुकदमा जारी रहने से उसकी अविवाहित साली तथा विवाहित साली के भविष्य पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

    वहीं, पत्नी के वकील ने दलील दी कि पति उससे दहेज की मांग करता था और उसे प्रताड़ित करता था। इसी उत्पीड़न के कारण उसे ससुराल छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। पत्नी ने अदालत को बताया कि वह पति के साथ रहने के लिए तैयार है और वैवाहिक जीवन जारी रखना चाहती है।

    मामले पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि किसी दस्तावेज या अन्य ठोस आधार के अभाव में FIR को वैवाहिक अधिकारों की बहाली की याचिका के जवाब में दर्ज कराई गई कार्रवाई नहीं माना जा सकता। अदालत ने दोहराया कि केवल पति की ओर से वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए आवेदन दाखिल किए जाने से आपराधिक कार्यवाही रद्द करने का औचित्य पैदा नहीं होता।

    पीठ ने यह भी टिप्पणी की कि यदि कोई पत्नी केवल अपना वैवाहिक जीवन बचाने के उद्देश्य से धैर्य रखती है और चुप रहती है, तो इसे उसकी कमजोरी नहीं माना जा सकता। इसके विपरीत, यह उसके वैवाहिक संबंधों के प्रति गंभीरता और ईमानदारी को दर्शाता है।

    अदालत ने कहा कि जब पत्नी को यह एहसास हो जाता है कि ससुराल वाले इस हद तक जा चुके हैं कि सुलह की संभावना नहीं बची है। इसके बाद वह अपने साथ हुई क्रूरता की शिकायत करते हुए FIR दर्ज कराती है, तो यह नहीं कहा जा सकता कि FIR मुस्लिम कानून के तहत वैवाहिक अधिकारों की बहाली या न्यायिक अलगाव की कार्यवाही के जवाब में दर्ज कराई गई।

    इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने पति की याचिका खारिज की। अदालत ने पाया कि पति के खिलाफ दहेज की मांग और क्रूरता के विशिष्ट आरोप लगाए गए, इसलिए उसके खिलाफ FIR रद्द करने का आधार नहीं बनता। हालांकि, साली और सास के खिलाफ कोई विशिष्ट आरोप नहीं पाए जाने के कारण हाईकोर्ट ने उनके खिलाफ दर्ज FIR रद्द की।


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