सुसाइड नोट न होने मात्र से आरोपी को आरोपमुक्त नहीं किया जा सकता, यदि आत्महत्या के लिए उकसाने का गंभीर संदेह हो: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
Amir Ahmad
26 Oct 2026 3:50 PM IST

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि सुसाइड नोट का न होना अपने आप में आरोपी को आरोपमुक्त करने का आधार नहीं हो सकता, खासकर तब जब रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से आत्महत्या के लिए उकसाने का गंभीर संदेह पैदा होता हो। इसी टिप्पणी के साथ जस्टिस पुष्पेंद्र यादव की पीठ ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 306 के तहत आरोप तय किए जाने को चुनौती देने वाली आरोपी की याचिका खारिज की।
कोर्ट ने कहा कि यदि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से प्रथम दृष्टया यह गंभीर संदेह पैदा होता है कि मृतका ने आरोपी के ऐसे आचरण के कारण आत्महत्या की, जो उसे ऐसा कदम उठाने के लिए उकसाने या प्रेरित करने में सक्षम था, तो केवल सुसाइड नोट न होने के आधार पर आरोपी को आरोपमुक्त नहीं किया जा सकता।
आरोपी ने सेशंस जज के उस आदेश को चुनौती देते हुए आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दायर की, जिसमें उसकी आरोपमुक्त करने की अर्जी खारिज की गई थी। ट्रायल कोर्ट ने उसके खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने के लिए IPC धारा 306, दुष्कर्म के लिए धारा 376, पीछा करने के लिए धारा 354डी और यौन उत्पीड़न के लिए धारा 354ए के तहत आरोप तय किए।
अभियोजन के अनुसार, 28 जनवरी, 2023 को शिकायतकर्ता की बेटी ने दुपट्टे से पंखे पर फंदा लगाकर आत्महत्या की थी। इस संबंध में मर्ग सूचना दर्ज की गई। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता लगातार उसकी बेटी को परेशान करता था और उसका पीछा करता था।
जांच के दौरान एकत्र की गई सामग्री के आधार पर IPC की धारा 306 के तहत FIR दर्ज की गई। आगे की जांच में योनि स्वैब की रिपोर्ट में मानव शुक्राणु पाए जाने की बात सामने आई। इसके बाद आरोपी के खिलाफ अश्लील मैसेज भेजने और यौन संबंध बनाने के लिए दबाव डालने से जुड़े आरोपों में अन्य धाराएं भी जोड़ी गईं। जांच पूरी होने के बाद आरोपपत्र दाखिल किया गया, लेकिन ट्रायल कोर्ट ने आरोपी की आरोपमुक्त करने की अर्जी खारिज कर आरोप तय किए।
आरोपी के वकील ने हाईकोर्ट में दलील दी कि उनका मुवक्किल बीएएमएस डॉक्टर और सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी है तथा उसे झूठा फंसाया गया। आरोपी और मृतका एक-दूसरे को अच्छी तरह जानते थे और अपनी-अपनी ड्यूटी पर जाने के लिए आरोपी की मोटरसाइकिल से साथ यात्रा भी करते थे।
बचाव पक्ष ने मृतका की ओर से पहले दर्ज कराए गए अन्य आपराधिक मामले का भी हवाला दिया। उस मामले में घर में अनधिकृत प्रवेश, स्वेच्छा से चोट पहुंचाने, सार्वजनिक स्थान पर अश्लीलता और यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए गए। हालांकि, मृतका के अभियोजन पक्ष के मामले का समर्थन नहीं करने के कारण आरोपी उस मामले में बरी हो गया।
आरोपी के वकील ने यह भी तर्क दिया कि मृतका परिपक्व महिला थी, उसका तलाक हो चुका था और उसने कोई सुसाइड नोट नहीं छोड़ा, जिससे यह संकेत मिलता हो कि आरोपी ने उसे आत्महत्या के लिए उकसाया था।
इसके विपरीत, राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि आरोप तय करने के चरण में अदालत को केवल यह देखना होता है कि प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं। अभियोजन ने यह भी दलील दी कि मृतका के कपड़ों से प्राप्त DNA प्रोफाइल आरोपी के DNA प्रोफाइल से मेल खाती है। गवाहों के बयानों के अनुसार, आरोपी लगातार मृतका का पीछा करता था, अश्लील मैसेज भेजता था और उसे मानसिक तथा शारीरिक रूप से प्रताड़ित करता था।
हाईकोर्ट ने सबसे पहले IPC की धारा 306 के तहत आत्महत्या के लिए उकसाने के प्रावधान पर विचार किया। कोर्ट ने बताया कि किसी व्यक्ति को किसी कार्य के लिए उकसाना, उस कार्य को करने के लिए एक या अधिक लोगों के साथ साजिश में शामिल होना, यदि उसके अनुसरण में कोई कार्य या अवैध चूक होती है, और किसी कार्य या अवैध चूक के जरिए जानबूझकर सहायता करना, उकसावे के दायरे में आ सकता है।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले रमेश कुमार बनाम छत्तीसगढ़ राज्य (2001) का हवाला देते हुए कहा कि उकसावे का आकलन आरोपी के कृत्यों, चूकों या लगातार किए गए आचरण के संदर्भ में किया जाना चाहिए। यदि आरोपी के व्यवहार से ऐसी परिस्थितियां पैदा हुई हों कि मृतक के सामने आत्महत्या करने के अलावा कोई विकल्प न बचा हो, तो परिस्थितियों के आधार पर उकसावे का निष्कर्ष निकाला जा सकता है।
आत्महत्या के कारणों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि इसका कोई आसान जवाब नहीं है। एक जैसी परिस्थितियों में अलग-अलग व्यक्ति अपने अनुभवों और घटनाओं के व्यक्तिगत प्रभाव के आधार पर अलग-अलग प्रतिक्रिया दे सकते हैं।
आरोप तय करने के चरण में अदालत को रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री और दस्तावेजों का मूल्यांकन करना होता है तथा यह देखना होता है कि उनके प्रथमदृष्टया स्वरूप से कथित अपराध के आवश्यक तत्व सामने आते हैं या नहीं।
मौजूदा मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि आरोपी कथित तौर पर लंबे समय तक मृतका को लगातार परेशान करता रहा, उसका पीछा करता था, उसे धमकाता और प्रताड़ित करता था। मृतका ने पहले भी उसके खिलाफ कार्रवाई की थी, लेकिन समझौते के बाद भी कथित उत्पीड़न जारी रहा।
कोर्ट ने उस घटना पर भी गौर किया, जिसमें आरोपी कथित तौर पर नशे की हालत में मृतका के कमरे में घुसा, उससे झगड़ा किया, उसके साथ दुर्व्यवहार और मारपीट की तथा उसका मोबाइल फोन तोड़ दिया। आरोप है कि आरोपी ने मृतका को धमकी दी कि यदि उसने समझौता नहीं किया तो वह उसके माता-पिता और बच्चों को मार देगा, उसका करियर बर्बाद कर देगा और उसके अश्लील वीडियो वायरल कर देगा।
पीठ ने कहा कि यदि इन परिस्थितियों को उनके प्रथमदृष्टया स्वरूप में स्वीकार किया जाए तो वे मृतका के लगातार उत्पीड़न को दर्शाती हैं। इस स्तर पर उन्हें महज झगड़ा या कोई अकेली घटना मानकर खारिज नहीं किया जा सकता। रिकॉर्ड पर मौजूद सभी सामग्री के संयुक्त प्रभाव से केवल सामान्य संदेह नहीं, बल्कि आरोपी की कथित संलिप्तता को लेकर गंभीर संदेह पैदा होता है, जो उसके खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त आधार है।
आरोपी और मृतका के बीच शारीरिक संबंध होने की दलील पर कोर्ट ने कहा कि इस पहलू की जांच ट्रायल के दौरान की जानी चाहिए। हाईकोर्ट इस चरण में विवादित तथ्यों पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दे सकता।
इसी तरह, पहले के मामले में बरी होने के आधार पर IPC की धारा 354डी और 354ए के तहत मौजूदा अभियोजन को चुनौती देने वाली दलील भी कोर्ट ने स्वीकार नहीं की। कोर्ट ने कहा कि पहले का मामला अलग आरोपों पर आधारित था, इसलिए उसमें बरी होने से मौजूदा मामले में उपलब्ध सामग्री पर विचार करने में बाधा नहीं आती।
इन सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने आरोपी की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज की और ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोप तय करने का आदेश बरकरार रखा।

