बुजुर्ग पुरुष परिजन पारिवारिक मुकदमे के लिए छोटी उम्र की महिला सदस्य पर निर्भर हो सकते हैं, ऐसी धारणा लैंगिक पूर्वाग्रहपूर्ण: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
Amir Ahmad
5 Oct 2026 3:24 PM IST

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि परिवार के बुजुर्ग पुरुष सदस्य पारिवारिक मुकदमे में जरूरी कानूनी कदम उठाने के लिए परिवार की अपेक्षाकृत कम उम्र की महिला सदस्य पर निर्भर हो सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि इसके विपरीत कोई भी धारणा स्वाभाविक रूप से लैंगिक पूर्वाग्रह से ग्रस्त और “विशिष्ट रूप से स्त्री-विरोधी” होगी।
जस्टिस अनुराधा शुक्ला ने मामले में प्रथम अपीलीय अदालत के उस तर्क को खारिज किया, जिसमें यह माना गया कि चूंकि अन्य अपीलकर्ता मोहर बाई से उम्र में बड़े हैं, इसलिए यह नहीं माना जा सकता कि मुकदमे की कार्यवाही संभालने के लिए वे उस पर निर्भर हैं।
हाईकोर्ट ने कहा कि देरी की माफी का आवेदन खारिज करने के लिए प्रथम अपीलीय अदालत द्वारा अपनाया गया यह तर्क कानूनी रूप से उचित नहीं था। कोर्ट के अनुसार, सभी अपीलकर्ताओं के मुकदमे से जुड़े आवश्यक कदम उठाने के लिए मोहर बाई पर निर्भर होने की दलील को केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि वह परिवार के अन्य सदस्यों से उम्र में छोटी महिला थीं।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि बुजुर्ग पुरुष परिवार के सदस्य किसी छोटी उम्र की महिला सदस्य पर पारिवारिक मुकदमे में आवश्यक कदम उठाने के लिए निर्भर नहीं हो सकते, ऐसी धारणा लैंगिक पूर्वाग्रहपूर्ण है और महिला सदस्य की क्षमता को कमतर आंकती है। कोर्ट ने कहा कि प्रथम अपीलीय अदालत के रिकॉर्ड में ऐसी धारणा को सही ठहराने के लिए कोई आधार नहीं था और यह टिप्पणी केवल अनुमान और धारणाओं पर आधारित प्रतीत होती है।
मामला जुगरी और उसके बेटे गोरलाल की महिला वंशजों के उत्तराधिकारियों द्वारा दायर दीवानी मुकदमे से जुड़ा था। वादी पक्ष ने विवादित संपत्ति में हिस्सा मांगते हुए दावा किया कि संपत्ति पैतृक थी। ट्रायल कोर्ट ने यह कहते हुए मुकदमा खारिज कर दिया था कि वादी संपत्ति के पैतृक होने का तथ्य साबित करने में असफल रहे।
इसके बाद वादी पक्ष ने प्रथम अपील दायर की, लेकिन अतिरिक्त जिला जज ने उसे निर्धारित अवधि के बाद दाखिल किए जाने के आधार पर खारिज कर दिया। इसके खिलाफ हाईकोर्ट में दायर दूसरी अपील में पक्षकारों ने कहा कि देरी के लिए वास्तविक और सद्भावनापूर्ण कारण बताए गए, लेकिन प्रथम अपीलीय अदालत ने न्यायोन्मुखी दृष्टिकोण अपनाने के बजाय अत्यधिक तकनीकी रुख अपनाया।
हाईकोर्ट ने पाया कि देरी माफ करने के आवेदन में बताया गया कि मुकदमे की कार्यवाही मोहर बाई देख रही थीं और 25 नवंबर से 12 दिसंबर 2011 के बीच वह गंभीर रूप से अस्वस्थ थीं। इसी कारण निर्धारित अवधि में अपील दाखिल नहीं की जा सकी।
प्रथम अपीलीय अदालत ने इस स्पष्टीकरण को पूरी तरह खारिज नहीं किया लेकिन यह कहते हुए आवेदन स्वीकार करने से इनकार किया कि मोहर बाई की बीमारी साबित करने के लिए कोई दस्तावेजी सामग्री पेश नहीं की गई।
हाईकोर्ट ने इस दृष्टिकोण पर भी आपत्ति जताई। कोर्ट ने कहा कि देरी के कारणों के संबंध में पक्षकारों को साक्ष्य पेश करने का अवसर ही नहीं दिया गया और उन्हें केवल अपनी दलीलें रखने का मौका दिया गया। ऐसे में बीमारी के आधार को केवल दस्तावेजी या मौखिक साक्ष्य पेश नहीं किए जाने के कारण खारिज नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि यह तय करने से पहले कि अपीलकर्ताओं ने देरी का कारण साबित नहीं किया, उन्हें बीमारी के आधार को साबित करने के लिए साक्ष्य पेश करने का अवसर देना जरूरी था।
हाईकोर्ट ने प्रथम अपीलीय अदालत द्वारा दिए गए दूसरे कारण को भी अस्वीकार किया। अदालत ने यह माना कि अन्य अपीलकर्ता मोहर बाई से उम्र में बड़े हैं, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि वह उनके मुकदमे की कार्यवाही संभाल रही हैं।
इस पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि उम्र और लिंग के आधार पर किसी महिला परिवार सदस्य की भूमिका और क्षमता के बारे में अनुमान लगाना उचित नहीं है। कोर्ट ने कहा कि ऐसी धारणा महिला परिवार सदस्य की क्षमता को कमजोर करती है और कानून के तहत इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने दूसरी अपील स्वीकार करते हुए मामला प्रथम अपीलीय अदालत को वापस भेज दिया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि पक्षकारों को परिसीमा अधिनियम की धारा 5 के तहत देरी माफी के आवेदन के संबंध में, यदि वे चाहें तो, साक्ष्य पेश करने का अवसर दिया जाए और तथ्यों तथा लागू कानून के आधार पर आवेदन पर नए सिरे से निर्णय लिया जाए।
कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि यदि देरी माफ करने का आवेदन स्वीकार किया जाता है तो प्रथम अपीलीय अदालत दोनों पक्षों को उचित सुनवाई का अवसर देकर अपील का गुण-दोष के आधार पर फैसला करे।

